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नया धमाका

3/21/2011

भारत के युवा : भविष्य की आशा

यूवा शक्ति राष्ट्र की रीढ़ होती है। युवा राष्ट्र और समाज की प्राण-वायु होते हैं। युवा राष्ट्र के भूत और भविष्य के सेतु होते हैं। वे राष्ट्र के जीवन मूल्यों के प्रतीक होते हैं। उनकी आखों में सपने देखने की ज्योति और शक्ति होती है। महान कवियित्री महादेवी वर्मा ने युवा में तीन गुणों का संगम माना है- अतीत की उपलब्धियों, मान्यताओं तथा आस्थाओं का, वर्तमान की समस्याओं को सुलझाने के लिए उन्हें देखने का, समाज की भावनाओं और आकांक्षाओं के स्वप्न बुनकर उनको आंखों में बसाने का। देश की युवा शक्ति ही राष्ट्र के जीवन मूल्यों तथा सांस्कृतिक विरासत का प्रसार तथा स्थायित्व प्रदान करती है। सदैव से भारतीय युवकों के प्रेरक तत्व हिन्दुत्व की उदात भावनाएं, आध्यात्मिक तथा सांस्कृतिक आधार, स्वाभिमान, त्याग तथा आत्मगौरव की भावनाएं, राष्ट्र प्रेम, मानव सेवा तथा देशभक्ति रहे हैं।
स्वतंत्रता आंदोलन में युवा
राष्ट्र निर्माण में सर्वाधिक योगदान युवाओं का होता है। भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में युवा शक्ति का सर्वाधिक योगदान रहा है। कलकत्ता विश्वविद्यालय से पास हुए प्रथम दो छात्रों में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय भी एक थे। परीक्षा पास करते ही वे सरकारी नौकरी में लग गये। एक बार उनकी भेंट स्वामी रामकृष्ण परमहंस से हुई। स्वामी जी ने पूछा, "तुम्हारा नाम बंकिम (झुका हुआ) क्यों है?" इस पर बंकिम ने उत्तर दिया- अंग्रेजों की चाकरी करते हुए झुकने से। पर इसके साथ ही उन्हें जीवन की दिशा मिल गई, शीघ्र ही उनके दुर्गेशनंदिनी से आनन्द मठ तक की सभी रचनाएं भारतीय युवकों में सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक प्रेरणा का रुाोत बन गर्इं और "वन्देमातरम्" भारतीय स्वतंत्रता का नाद, मूलमंत्र तथा प्रेरणा बिन्दु बन गया। इसी भांति सीधे ब्रिाटिश शासन के अन्तर्गत "इंडियन सिविल सर्विस" परीक्षा पास किये सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, अरविन्द घोष तथा सुभाष चन्द्र बोस जैसे युवाओं ने सरकारी नौकरी न करके राष्ट्र सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, जिन्हें लोग "सरेण्डर नॉट" कहते थे, ने अंग्रेजों के कानूनों का विरोध किया। अरविन्द घोष ने प्रारंभ में क्रांतिकारी तथा बाद में आध्यात्मिक मार्ग अपनाया। सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के द्वारा इस देश की स्वतंत्रता के लिए अथक प्रयास किया।
राष्ट्र जागरण के संत
स्वामी विवेकानन्द ने अपनी युवा अवस्था में न केवल भारत को सशक्त राष्ट्र के रूप में अग्रसर तथा विकसित किया बल्कि भारत को विश्व के एक महान राष्ट्र होने की स्थिति में लाकर खड़ा किया। वे सही अर्थों में भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि थे। वे समाज सुधार तथा राजनीतिक पुनरुत्थान से पूर्व धार्मिक अभ्युत्थान को आवश्यक मानते थे। उन्होंने युवाओं में वीरता, साहस का भाव जगाते हुए दुर्बलता को पाप बतलाया। उन्होंने देश के युवाओं में आत्मविश्वास तथा स्वाभिमान का भाव जागृत किया। स्वामी रामतीर्थ ने देशभक्ति तथा राष्ट्रप्रेम की भावना जगाई। स्वामी श्रद्धानन्द ने प्रत्येक भारतीय युवा को अपने घर में भारत का मानचित्र लगाने तथा उससे नित्य प्रेरणा प्राप्ति के लिए प्रेरित किया।
राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रमुख नेताओं ने राष्ट्रोत्थान तथा सांस्कृतिक उन्नति के लिए युवकों को संगठित करने के प्रयास किये। उदाहरण के लिए गोपाल कृष्ण गोखले ने "सरवेन्ट्स आफ इंडियन सोसायटी", लाला लाजपतराय ने "लोक सेवक मण्डल", गांधी जी ने साबरमती आश्रम तथा मदनमोहन मालवीय ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। इसी दृष्टि से एक महत्वपूर्ण प्रयास डा. केशवराव बलिराम हेडगेवार का रहा, जिन्होंने डाक्टरी पास करने के बाद राष्ट्र संगठन को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।
क्रांतिकारी
देश की स्वतंत्रता के लिए सर्वाधिक प्रयास देश के युवा क्रांतिकारियों के थे, जिन्होंने अपनी छोटी आयु में बलिदान दिये। 1857 के महा संग्राम से लेकर 15 अगस्त, 1947 तक क्रांतिकारियों की एक लम्बी श्रृंखला रही। वासुदेव बलवन्त फड़के, चाफेकर बंधु, सावरकर बंधु, मदनलाल धींगरा, खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चन्द्र चाकी इसी बलिदानी परम्परा में आते हैं जिन्होंने अपना लहू देकर देश की माटी के प्रति असीम श्रद्धा तथा भक्ति का परिचय दिया। इसी भांति भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, चन्द्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल तथा अशफाक उल्ला खां ने देश की रक्षा तथा धर्म- संस्कृति के लिए अपने प्राणों को हंसते-हंसते न्योछावर किया। गीता पर हाथ रखकर, पुनर्जन्म की कामना कर अनेक युवकों ने प्राणों की आहुति दी।
जागरण की गति धीमी हुई
दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के पश्चात जहां देश में स्वदेशी राजनीतिक प्रभुत्व बढ़ा, वहां सांस्कृतिक जागृति तथा नैतिक जीवन मूल्यों की गति धीमी हो गई। पाश्चात्य अंधानुकरण तथा उसकी भौंड़ी नकल को प्रोत्साहन मिला। आशा के विपरीत संस्कृति, राष्ट्र की स्वामिनी बनने की बजाय राजनीति की दासी बन गई। भारत की वैश्विक संस्कृति का स्थान तथाकथित मिश्रित संस्कृति ने ले लिया। धर्म भी सेकुलरवाद के मायाजाल में फंस गया। गत पचास-साठ वर्षों में देश के थके- हारे नेतृत्व ने अथवा वर्तमान में विश्व के सर्वाधिक वृद्ध व्यक्तियों के मंत्रिमण्डल ने भारत के युवक- युवतियों को न नेतृत्व दिया और न ही उनका नेतृत्व किया। उनका राष्ट्र निर्माण में सदुपयोग नहीं हुआ। सांस्कृतिक प्रतिभाओं के नाम पर उनके जीवन के साथ खिलवाड़ किया गया। नैतिक उत्थान तथा आध्यात्मिक बोध के स्थान पर दी गई अंधाधुंध धन कमाने की होड़। संस्कृति के नाम पर फूहड़ अपसंस्कृति, स्वदेश प्रेम के स्थान पर परनाकुरण की प्रवृत्ति। स्वाभाविक है कि देश के युवक-युवतियों के लिए भटकाव आया।
पर युवा गतिशील
परन्तु इस विकट परिस्थिति में भी भारत के युवकों ने शिक्षा, साहित्य, कला, खेल, विज्ञान तथा तकनीकी आदि क्षेत्रों में विश्व में अपना स्थान बनाया। जहां इसी युवा शक्ति ने पाकिस्तान से हुए चार यु#ुद्धों में अपनी वीरता, शौर्य तथा देशभक्ति का परिचय दिया, वहीं जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भारत में सम्पूर्ण क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके साथ ही इन्दिरा गांधी द्वारा लादे गए आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष में अद्भुत साहस का परिचय दिया। आपातकाल के दौरान जेलों में यातनाएं सहने वालों में देश के नवयुवक सर्वाधिक थे। नेतृत्वहीन, दिशाहीन तथा उपेक्षित होने पर भी भारत का युवा अपने राष्ट्रीय हितों, सांस्कृतिक विरासत तथा अपने कर्तव्यों को नहीं भूला। देश-विदेश के अनेक प्रबुद्ध विद्वान उनके प्रति आश्वस्त हैं। नोबल पुरस्कार विजेता वी.एस. नयपाल का कथन है- "कोई भी कुछ कहे, पर आज एक हिन्दू भारत फिर से विकसित हुआ है और अतीत के पिछले, किसी भारत की तुलना में, आज वह अधिक परिपक्व और एकीकृत है।" साइप्रस में भारत के राजदूत रहे पवन कुमार वर्मा का मत है कि 21वीं शताब्दी भारतीयों की होगी। भारत के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को तो देश की युवा शक्ति पर पूरा विश्वास है। उन्होंने अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक "इंडिया 20-20" में पूरे विश्वास के साथ सन् 2020 तक भारत का अभ्युत्थान माना है। उन्होंने लिखा, "2020 के भारत को लेकर मेरे मन में कल्पना है। वह ऐसा राष्ट्र होगा जहां शहरी और ग्रामीण आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होगा। ऊर्जा और स्वच्छ पानी तक सबकी पहुंच होगी। एक ऐसा राष्ट्र, जिसमें कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र एक साथ मिलकर कदम से कदम, मिलाकर काम करेंगे। जहां कोई भी प्रतिभाशाली विद्यार्थी सामाजिक या आर्थिक भेदभाव की वजह से गुणवता वाली शिक्षा हासिल करने से वंचित न होगा।"
वैश्विक जगत का विश्वास
वस्तुत: भारत में युवकों की बढ़ती हुई जनसंख्या विदेशी विद्वानों में अद्भुत हलचल पैदा कर रही है। चीन के जनसंख्या और विकास शोध केन्द्र के महानिदेशक जियांग वीपिंग इससे अत्यधिक चिंतित हैं कि 2050 तक चीन का हर चौथा व्यक्ति 65 साल से अधिक आयु का होगा तथा उस समय तक सर्वाधिक आवादी वाला देश भारत होगा, जहां सर्वाधिक युवा होंगे। अत: भारत एक महाशक्ति के रूप में उभरेगा। फ्रांस के प्रमुख पत्र ली फिगारो के विशेष संवाददाता फरोनोस ग्यूटियर का निष्कर्ष है कि भारत का पुनर्जन्म हो रहा है। अब वह देश की युवा शक्ति के द्वारा उद्योग, अर्थव्यवस्था, सेना व आध्यात्मिकता में "सुपर पावर" होगा।
विश्व के विद्वान आज भी भारतीय संस्कृति को विश्व संस्कृति के रूप में देखते हैं। भारत की संस्कृति वसुधैव कुटुम्बकम् अथवा सर्वे सुखिन: संतु का भाव व्यक्त करती है। अमरीका के प्रसिद्ध विद्वान वामदेव शास्त्री (डेविड फ्राले) विश्व के कल्याण के लिए भारतीय युवकों का आह्वान करते हुए कहते हैं, "हे अर्जुन (भारतीय युवक) अब तो उठ, तू उठेगा तो सबका कल्याण होगा, भारत का भी और विश्व का भी।" आवश्यकता है देश की युवा शक्ति द्वारा एक सांस्कृतिक क्रांति की, जो सकारात्मक, रचनात्मक तथा विवेकपूर्ण हो। आवश्यकता है युवकों में एक दृढ़ इच्छाशक्ति की, भारतीयता की सही पहचान की। आवश्यकता है सांस्कृतिक पुनर्चिन्तन, पुनर्रचना तथा पुन: राष्ट्रोत्थान की। तभी भारत एक सजग, सबल, सशक्त राष्ट्र बनेगा तथा विश्व के लिए कल्याणकारी भी।

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