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नया धमाका

11/23/2010

ओ प्राचीन भारत पुनः जागो! पांच सदियों की आत्म वंचना के बाद, तीसरी सहस्त्राब्दि के लिए भारत का यही आदर्श वाक्य होना चाहिए।

क्यों होना चाहिए, अपनी गरीबी के बावजूद, मुसलमानों द्वारा किए गए नरसंहारों के बावजूद, चीनी संकट आक्रमणों के बावजूद व पश्चिमी सभ्यता के ढ़ांचे के बाद भी भारत में व्यक्त होने के लिए, भारत को एक नवीन राष्ट्र के ढ़ांचे में 21वीं सदी की एक महाशक्ति के रूप में ढ़ालने के लिए तैयार है। परन्तु इन सबके लिए एक युक्ति आवश्यक है:-
देश उठेगा अपने पैरो, निज गौरव के भान से।
 स्नेह भरा विश्वास जगाये जिये सुख सम्मान से।।
हमें निम्न प्रश्नों पर विचार करना होगा कि:-
भारत का अपना कोई धर्म नहीं:-
धर्म के कानून को छोड़कर भारत के लिए सच्चा लोकतंत्र क्या हो सकता है। धर्म निरपेक्ष होना, सभी धर्मो का आदर करने का अर्थ यह तो नहीं कि भारत का अना कोई धर्म ही ना हो। यही है वह कानून जिसे पुनःस्थापित करना होगा। लोकतांत्रिक भारत की नींव होना होगा। धर्म लोकतंत्र की आधारशिला है यह पूरे विश्व को मानना ही होगा।
भारत की अपनी राजव्यवस्था नहीं :-सबसे अद्भुत बात यह है कि व्यवहारिक रूप से भारत को अपने गांवो की पुरानी पंचायत व्यवस्था के रूप में नये मॉडल का नमूना उपलब्ध है, जिसको पुनः जीवित करना होगा और ऊपर तक लागू करना होगा जिसका कि भारत की जनता के साथ सीधा व जीवंत सम्बंध था। दूसरी ओर संसदीय प्रणाली जन साधारण के साथ सम्पर्क खो बैठी है। तमिलनाडू या आन्ध्रप्रदेश से निर्वाचित सांसद अपना अधिकतर समय दिल्ली में गुजारता है जो कि एक कृत्रिम अहम्मन्यतापूर्ण सुदूरस्थ नगर है यहां महलों के समान शानदार बंगले, कार, नौकर-चाकर और चापलूसी इन सांसदों को भ्रष्ट होने का प्रलोभन देते है। वस्तुतः हमें अपनी राजव्यवस्था की ओर पुनः लौटना ही होगा।
भारत की अपनी न्याय यवस्था नहीं:-वर्तमान न्यायतंत्र जिसमें लाखों की संख्या में अनिर्णीत मुकद्दमें पड़े है जिनका फैसला होने में कभी-कभी कई दशक लग जाते है, जिसके वकील अपनी हास्यास्पद पोशाकों में कौवों के समान लगते है, मनु के विधान को नवीन न्यायतंत्र में रूपांतरित करना होगा ( संयुक्त राष्ट्र संघ में कार्यालय के बाहर एक प्रतिमा लगी है जिसके नीचे लिखा है कि The fisrt founder of law in the universe - the Manu)। कथित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का प्रतिपादन करने वाले पश्चिमी मापदण्डों के आधार पर, जिनकी भारत के लिए कोई प्रासंगिकता नहीं है, न्याय नहीं किया जाना चाहिए।
भारत की कोई राष्ट्रभाषा नहीं:-देश को एकता के सूत्र में पिरोन का कार्य मुख्य रूप से राष्ट्रभाषा का है। लेहरूजी ने सोचा था कि अंग्रेजी देश को एकता के सूत्र में पिरोने वाली भाषा हो सकेगी किंतु केवल 10 प्रतिशत भारतीय ही अंग्रेजी भली प्रकार से जानते है और हिन्दी केवल उत्तर भारत तक ही सीमित है लेकिन भारत के बहुत कम लोग यह जानते है कि सभी भाषाओं की जननी संस्कृत भाषा भारत को उपलब्ध है। यह भाषा इतनी कलिष्ट, सूक्ष्म और समृद्ध है कि कोई भी वर्तमान भाषा उसकी बराबरी नहीं कर सकती। यह भारत को जोड़ने वाली भाषा सहज ही बन सकती है। इसको अपने भारी आडंबरपूर्ण शैली से भद्धी चाल वाले असंभव समासों तथा भारी वितंडावाद से पूर्ण पांडित्य से मुक्त करना होगा तब यह भारत के पुनरूत्थान की प्रभात बेला का संकेत होगा।

1 टिप्पणी:

  1. aapki baate muje purn manya hai..
    apna hindu dharm sanktome hai..
    aaj hi hume isse bachana hoga. aur hindu dharm ko khatam karne ka kaam b apne hi log kar rahe hai..
    jay hind..

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