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नया धमाका

1/05/2011

भ्रष्टाचार और दलाल, देश हुआ हलाल

दो दशक पुराना बोफोर्स का जिन्न आयकर न्यायाधिकरण की एक रिर्पोट के कारण फिर बाहर आ गया है। आयकर न्यायाधिकरण की यह रिर्पोट ऐसे समय में आई है जब सरकार इस मामले को सबूतों के अभाव में बंद करने की कोर्ट से गुजारिश कर रही है। आयकर न्यायाधिकरण ने इस सौदे में 41 करोड़ रुपये की दलाली के लेन-देन की बात की है और साथ ही कहा है कि इतनी-इतनी राशि विन चढ्ढा और ओटावियों क्वात्रोची के खातों में जमा भी की गई। देश में भ्रष्टाचार का इतना बोलबाला हो गया है कि पिछला पूरा वर्ष राष्ट्रमंडल खेलों में धांधली की चर्चा ही मीडिया में छाई रही अभी यह चर्चा जारी ही थी कि महाराष्ट्र में आदर्श सोसाइटी घोटले के कारण मुख्यमंत्री अशोक चह्राण को अपनी कुर्सी गवानी पड़ी।

देश में सबसे बड़े घोटले के रुप में 2-जी स्पेक्ट्रम घोटला चर्चा में आ गया। इस घोटले ने पिछले सभी रिकार्ड तोड़ दिये। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिर्पोट में गड़बड़ी की चर्चा की गई। उच्चतम न्यायालय ने 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटले को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से शपथ पत्र मांगा। ऐसा पहली बार हुआ कि जब किसी घोटाले के सिलसिले में शीर्ष अदालत ने सरकार के मौखिक जवाब पर शक जाहिर करते हुए आदेश दिया कि वह इस मामले में प्रधानमंत्री की चुप्पी या उनकी सक्रियता से जुड़े जवाबों को शपथ पत्र के माध्यम से रखे।
इस घोटाले के कारण संसद का पिछला सत्र बिना कोई काम किये ही समाप्त हो गया क्योंकि सरकार विपक्ष की संयुक्त संसदीय समिति से जांच की मांग पर सहमत नही हुई। इन तमाम घोटालो के कारण कांग्रेस पार्टी की लोकप्रियता में एक बड़ी गिरावट आई है। आम आदमी इन घोटालों के कारण बेहद निराश हो गया है। और वह यह भी जानता है कि चाहे जेपीसी बने या कोई आयोग। घोटाला करने वालों का कुछ बिगड़ने वाला नही है। आज अगर अपनी पार्टी के दबाव में आकर अशोक चह्राण और दूरसंचार मंत्री राजा इस्तीफा दे देते है तो अगले चुनाव में वह पुनः अपनी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीत कर फिर आ जायेगे।

देश की आधी से ज्यादा आबादी तो यह ही नही जान पाती कि घोटाला किस चीज का हुआ है। राजनीतिक पार्टियों को अपने इन घोटालो में लिप्त सदस्यों के कारण कोई खास फर्क नही पड़ता। अब इन घोटालों को समझना आसान नही रहा। अब तक भ्रष्टाचार के जो रुप हमारे सामने आते रहे है, वे आम तौर पर रिश्वतखोरी और कालाबाजारी के रहे है। लेकिन जबसे इसमें राजनीतिक लोग शामिल होने लगे है तब से मामला बहूत गंभीर हो गया है। हमारे यहां भ्रष्टाचार किसी संगीन जुर्म में नही आता। इसी लिए यह एक बड़े कारोबार का अकार लेता जा रहा है। बड़े घोटालेबाज अपनी राजनीतिक एवं प्रशासनिक पुहंच के कारण बचे रहते है। इनकी जांच करने वाले आयोग और जांच ऐजसियां मामलों को इतना लम्बा चलाती है कि लोग सब भूल जाते है, हां छोटे मोटे अपराधियों के लिए न्यायचक्र अपना काम करता रहता है। छोटी मोटी चोरियों, गबन, रिश्वतखोरी आदि में लिप्त अपराधी सजा पा ही जाते है, परन्तु यह बड़े अपराधी बचे रहते है। राजनीतिक पार्टियों को अपने इन घोटालो में लिप्त सदस्यों के कारण कोई खास फर्क नही पड़ता।

कृष्ण मेनन से लेकर कृष्णामचारी तक और बोफोर्स और प्रतिभूति घोटालों में आज तक किसी को कोई सजा नही हुई। दरअसल सरकारे खुद भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती रही है और यह समास्या स्वतंत्रता के पूर्व से चली आ रही है। 1937 में बनी कांग्रेसी सरकारों पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप लगे थे, भ्रष्टाराचार के विरोध में गांधी जी ने सत्याग्रह किया था। 1967 में बनी श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार पर भष्ट्राचार को बढ़वा देने का आरोप भी लगा। 1961 में प्रताप सिंह केरो द्वारा पंजाब में अपने बेटे को सिनेमा हाल बनाने के लिए सरकारी जमीन कोड़ियों के भाव देने का मामला भी चर्चित रहा है। 1984 में राजीव गांधी की सरकार और 1991 में नरसिंह राव सरकार पर भी ऐसे आरोप रहे है।

भ्रष्टाचार के तमाम मामले दम तोड़ चुके है और आज जो चर्चा में है समय के साथ साथ इनका भी वही परिणाम होगा। जिस तरह की सक्रियता आज न्यायालय और मीडिया 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटले में दिखा रहे है ऐसी ही सक्रियता कभी हवाला कांड में देखने को मिलती थी उसका क्या हुआ मालूम नही। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरुरत है जो कही दिखाई नही देती। मीडिया भी अब इससे बचा नही रहा। निराशाजनक यह है कि सामाजिक सेवा करने वाले गैर सरकारी संगठनों पर भी भ्रष्टाराचार के छीटे पड़ रहे है उनके लेन-देन में पररर्दिशता की बेहद कमी है। भ्रष्टाराचार से लड़ने वाले मोर्चे पर हम बेहद कमजोर होते जा रहे है। ऊपर से राजनेताओं, व्यपारियों और नौकरशाहों का एक ऐसा गठजोड़ बनता जा रहा है जिसका एक मात्र मकसद ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना हो गया है। अद्योगिक घरानों से जुड़े लोग अब सीधे राजनीति में आने लगे है और इनकी संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। जनसेवा के नाम से जानी जाने वाली राजनीति अब एक कारोबार का रुप लेती जा रही है जो आम आदमी के हित्त में नही है।

राजनीति और नौकरशाही के स्तर पर बढ़ते भ्रष्टाराचार से आम आदमी को जहां उसका वाजिब अधिकार नही मिल पा रहा वही देश की साख पर बट्टा भी लग रहा है। भ्रष्टाचार हमारी रगों में समा गया है और हम उसे निकाल नही पा रहे है। भ्रष्टाचार पर व्यापक बहस की जरुरत है कि आर्थिक अपराध करने वाला आखिर क्यों असानी से छूट जाता है? क्यों इसे संगीन अपराध नही बनाया जाता? सारा देश देख रहा है कि इतने बड़े बड़े घोटले बाहर आ रहे है और सरकार जेसीपी नही बनाने पर ही अड़ी हुई है। देश कब तक यह सब बर्दाशत करता रहे?

1 टिप्पणी:

  1. जनसेवा के नाम से जानी जाने वाली राजनीति अब एक कारोबार का रुप लेती जा रही है जो आम आदमी के हित्त में नही है।

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