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नया धमाका

11/22/2010

सत्ता का डोला ईमान - बंजर धरती लाचार किसान!

लाचारी ,महंगाई और उससे उपजी किसानों की आत्मघाती प्रवृति को नजर अंदाज कर  कांग्रेस ने इस साल फिर देश के किसानों की बेचारगी को और भी गहरा कर दिया है |सरकार ने गेंहू और सरसों  का न्यूनतम समर्थन मूल्य सिर्फ २० रूपए बढ़ाकर  किसानों के लिए मुश्किल हालात पैदा कर दिए हैं  ,ये हाल तब है जब तमाम फसलों की नाकामी के बाद ज्यादातर सीमान्त  कृषक अपने जीवन यापन के लिए गेंहू की फसल पर ही निर्भर हैं ,सरकार द्वारा प्रति क्विंटल १.८ प्रतिशत की मामूली बढोतरी के साथ गेंहू का समर्थन मूल्य ११२० रूपए प्रति क्विंटल किया गया है वहीँ सैफ्लावर  का भी समर्थन मूल्य भी महज २० रूपए बढाकर १८५० रूपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है | जबकि मसूर और चने की दालों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में ३८० रूपए प्रति क्विंटल तक की बढोतरी की गयी है |न्यूनतम समर्थन मूल्य वह कीमत होती है को सरकार किसानों से उनकी उपज खरीदने के लिए भुगतान करती है |गौरतलब है कि चना ,मसूर और सूरजमुखी आदि फसलों की सरकारी खरीद नहीं होती इसलिए सरकार ने इनके न्यूनतम समर्थन मूल्य में दरियादिली से वृद्धि की है|नजरिया साफ़ है सरकार के पास किसानों को देने के लिए पैसे नहीं हैं सरकार का ये अजीबोगरीब फैसला तब आया है ,जब देश की तीन चौथाई  आबादी की रसोई  से दाल लगभग गायब हो चुकी है ,सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खस्ताहाल संरचना  गरीबों को लाभ पहुंचाने के बजाय उनके मुंह से निवाला छिनने का काम कर रही है |सरकार के इस निर्णय का मतलब साफ़ है ,सरकार गोदामों में लगातार सड़ रहे अनाज का ठीकरा सीधे सीधे किसानों के सर पर फोड़ना चाहती थी ,सीधे कहें तो ये एक तरह की अपरोक्ष धमकी थी कि ज्यादा गेंहू उगाओगे तो हम भी पैसे नहीं देंगे ,देश के तमाम पठारी इलाकों में जहाँ जैविक खेती की तमाम संभावनाएं दम तोड़ चुकी है ,और किसानों के लिए गेंहू का कोई विकल्प मौजूद न हो ,वहां के किसान इन परिस्थितयों में आत्महत्या न करें तो क्या करें |
हरे भरे खेतों से ज्यादा क्रिकेट के मैदान को तरजीह देने वाले  और नेहरु गाँधी के परिवारवादी परम्परा का अनुसरण कर देश की जनता और  किसानों को निरंतर रुला रहे शरद पंवार  और उनके कृषि मंत्रालय से हम  इससे ज्यादा उम्मीद  नहीं कर सकते थे |आर्थिक मामलों पर  मंत्रिमंडल की  समिति से २०१०-११ के लिए जब रबी की फसलों के एसएसपी को मंजूरी दी तो उसके पास  कृषि मंत्री की सिफारिशें थी |इन सिफारिशों  के आधार पर गेंहू का समर्थन मूल्य ११० से बढाकर ११२० रूपए ,मसूर दाल का एसएसपी ३८० रूपए (२०.३ प्रति सैकड़ा )बढ़कर २,२५० रूपए प्रति क्विंटल और चने की दाल का एमएसपी ३४० रूपए बढ़ाकर  २,१०० रूपए प्रति क्विंटल कर दिया |जों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में ३० रूपए की  बढोतरी की गयी है और अब  यह ७८० रूपए प्रति क्विंटल हो गया है |मगर सरकार का कहना है कि  पिछले साल दाल के दामों में हुयी बेतहाशा वृद्धि का हवाला देते हुए इस साल दालों के उत्पादन को प्रोत्साहन देने और आयात पर निर्भरता घटने के लिए इनके न्यूनतम समर्थन मूल्य में खासा इजाफा किया है |नाम न छपने की शर्त पर केंद्रीय कृषि मंत्रालय के एक सचिव कहते हैं अनाज को सड़ाने के अलावा महंगाई को लेकर हमारे मंत्रालय को जितनी गालियाँ मिली हैं उसकी एक बड़ी वजह किसानों का मनमाना उत्पादन है, इस परिपाटी को कम करने के लिए न्यूनतम  मूल्य का मौजूदा निर्धारण बिलकुल सही है|
हिंदुस्तान दुनिया का सबसे  बड़ा दाल उत्पादक देश है लेकिन फिर भी तमाम दावों के बावजूद दाल के दामों में उछाल को नहीं रोका जा सका है कृषि मत्रालय २०१०-११ में दालों का उत्पादन १.६५ करोड़ तन तक पहुँचाने के लक्ष्य रखा है ,पिछले साल देश में दाल का उत्पादन १.४५ करोड़ टन था  ,जबकि देश में हर साल; लगभग १.८ से १.९ करोड़ टन तक दाल की जरुरत होती है ,घरेलु मांग को पूरा करने के लिए सालाना ३५ से ४० लाख टन दाल का आयात करना होता है यहाँ ये बात काबिले गौर है कि दाल के उत्पादन को न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि के बावजूद बढाने में बहुत कम सफलता  मिली है इसकी एक बड़ी वजह असामान्य  बरसात और सिंचाई के साधनों के अभाव के अलावा मिटटी की उर्वरा क्षमता में निरंतर होने वाला हास है |ज्यादातर गरीब किसान इन परिस्थितयों  से लड़ नहीं पाते और गेंहू एवं चावल के उत्पादन को ही प्राथमिकता  देते हैं |उत्तर प्रदेश ,मध्य प्रदेश ,बिहार ,झारखण्ड और छतीसगढ़ में गेंहू और चावल का उत्पादन सीधे तौर पर आजीविका के साथ साथ भूख  से जुड़ा हुआ है ,पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो ज्यादातर छोटे किसान उत्पादन का एक हिस्सा अपने भोजन के लिए रखते हैं और एक छोटा हिस्सा सरकारी रेट पर बेंच देते हैं |मगर गेंहू उत्पादन के साथ बरते जा रहे इस पक्षपात ने उनके लिए अब बेहद कठिन परिस्थितयां पैदा कर दी है |ये जरुरु है कि खरीफ सत्र में दालों के उन्च्वे समर्थन मूल्य से इसके बुवाई क्षेत्र में उल्लेखनीय इजाफा हुआ है और खरीफ सत्र का उत्पादन बढ़कर ६० लाख टन हो जाने की उम्मीद है ,पिछले साल खरीफ सत्र में दालों का उत्पादन लगभग ४३ लाख टन रहा था |
किसान नेता महेशानंद कहते हैं ये किसानों के साथ कम से कम छोटी जोत के किसानों के साथ बहुत बड़ा अन्याय है ,सरकार को गेंहू के समर्थन मूल्य में भी कम से कम १० फीसदी की वृद्धि करनी चाहिए थी |सही कहते हैं महेशानंद, उत्पादन के प्रोत्साहन हेतु उपजों के साथ समर्थन मूल्यों से जुडी साजिशों को करने के बजाय ये ज्यादा अच्छा होता कि सभी फसलों के साथ बराबरी का रवैया अपनाया जाता | जहाँ पर किसान दलहन की फसलों से बचने की कोशिश कर रहे हैं वहां सिंचाई के संसाधन विकसित किये जाते और भूमि संवर्धन की नयी तकनीकों को किसानों को मुफ्त में उलब्ध कराया जाता |दलहन के समर्थन  मूल्य में वृद्धि से किसी को आपत्ति नहीं है लेकिन ये भी सच है और यदि गेंहू और सरसों के अत्यधिक उत्पादन  और उसके रख रखाव से जुद्दी चिंताएं भी है, तो उन चिंताओं का निस्तारण सार्वजनिक वितरण प्रणाली को और भी लचीला बनाकर साथ ही गरीबी और भूखमरी के खिलाफ एक अस्त्र के रूप में किया जा सकता था |अपनी तनख्वाह बढ़ने के लिए बेशर्मी की सारी हदें पार करने वाली  और  वेतन आयोगों की सिफारिशों  के माध्यम से सरकारी कर्मचारियों को साहब बनाने में जुटी सरकार ने किसानों के पक्ष में ऐसा कभी नहीं किया जिससे उनकी स्थिति में सुधार आये और वो भी खुशहाल जिंदगी जी सकें |

1 टिप्पणी:

  1. सभी पार्टिया और सरकारे किसानों की विरोधी है, ऐसे में किसानों को सबसे पहले खुद संगठित होना चाहिए

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