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नया धमाका

11/22/2010

इतिहास भी खामोश है जिनके बारें में : गाडोलिया लुहार

राजस्थान की वीरप्रसूता भूमि का कण-कण शूरवीरों, योद्धाओं, भक्तों, त्यागियों और दानियों की अनगिन गाथाओं से भरा हुआ है। इतिहास बताता है कि राजस्थान की धरती और यहां के निवासियों ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए सर्वाधिक विदेशी आक्रांताओं से लोहा लिया। मुगलों के शासनकाल में मेवाड़ रियासत का दिल्ली के बादशाह अकबर से किया गया युद्ध भारत के इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ तो है ही साथ ही भारतवासी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किस प्रकार से आत्मोत्सर्ग कर सकते है उसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
 इतिहास के पन्ने उलटने से पता चलता है कि जब पूरे राजपूताने के अधिकांश राजाओं- महाराजाओं ने अधीनता स्वीकार कर ली थी तो उस समय मात्र राणा प्रताप ही ऐसे थे जिन्होने विदेशी और विधर्मी सत्ता के आगे समर्पण करने या मुगल राजा के साथ रोटी-बेटी का नाता करने तथा किसी भी प्रकार का सम्बंध रखने से इंकार करते हुए अपने देश की आजादी, सार्वभौमिकता, एकता व अखण्डता को अक्षुण्ण रखने का संकल्प लिया था।
 जिस समय चित्तौड. पर मुगल आक्रांताओं द्वारा आक्रमण किया गया, बड.े पैमाने पर पूजा स्थल ध्वस्त किए गए, बाल- वृद्ध, नारी सभी का बड.ी बेरहमी से कत्ल किया गया तो एक प्रकार से पूरा चित्तौड. सूना सा हो गया। चारों ओर जहां देखों मरघट सा सन्नाटा दिखाई देता था, स्थान - स्थान पर पड.े लाशों के ढ़ेर मुसलमानों की क्रूरता की कहानी बयान कर रहे थे उस समय चित्तौड़ की बची-खुची जनता जान बचाने के लिए जंगलों की ओर भाग गई। भूतपूर्व अंग्रेज सेन्सश सुपरिटेडेन्ट विटस ने अपनी पुस्तक राजपमताना में से दस साल में लिखा है कि जंगलों में छिपे लोगो को जब चित्तौड़ में हुए व्यापक और लोमहर्षक नरसंहार का पता चला तो उनका खून खौल उठा। उन्होने चित्तौड़ आकर देखा कि चारों ओर आग की लपटे उठ रही है। इन लोगो का जोश जागा और अपनी मातृभूमि के लिए कुछ करने की ललक उनमें उठी। ये लोग कोई राजनैतिक इच्दा वाले लोग नहीं थे और न ही कोई साधन सम्पन्न जमींदार। किंतु मेवाड़ के लिए कुछ करना है ऐसा प्रण लेकर वो ऐसा चले कि आज तक अपना कोई स्थायी ठिकाना नहीं बना पाये। जी हां हम बात कर रहे है महाराणा प्रताप के उन विश्वस्त सहयोगियों और भारत माता के सपूतो की जिनको सारा देश आज गाडोलिया लुहार के नाम से जानता है।
 अंग्रेज सेन्सश सुपरिटेडेन्ट विटस के अनुसार, ये लोग मूलतः चित्तौड़ के निकट लुहारूगढ़ के निवासी थे और इनके पूर्वज भी चित्तौड़ राजघरानों के लिए हथियार बनाने का कार्य करते थे। जब महाराणा प्रताप को चित्तौड़ छोड़कर अन्यंत्र जाना पड़ा तो उन्होने उस समय प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मैं चित्तौड़ को विधर्मियों से आजाद नहीं करा लूंगा तक तक भूमि पर शयान करूगां, घास-फूस की रोटी खाकर भी जीवन निर्वाह करूंगा। इतिहास बताता है कि महाराणा के साथियों जिनमें बड़ी संख्या में ये गोडोलिया लुहार शामिल थे ने भी ऐसा ही संकल्प लिया था कि जब तक उनकी मातृभूमि पर उनका अधिकार नहीं होगा तब तक वे घुमक्कड़ रूप् में ही जीवन यापन करेगे अर्थात एक स्थान पर स्थायी ठिकाना बनाकर नहीं रहेगे। उस समय की परिस्थितियों के अनुसार यह एक अनुकूल निर्णय था किंतु तब से लेकर आज तक ये गोडोलिया लुहार दर-दर की ठोकरे खाते दिखाई देते है। एक सामान्य सी बनी लकड़ी की बैलगाड़ी, चन्द टूटे-फूटे बरतन और सीमित संसाधनों के बल पर ये लोग आज भी पूरे देश में घूमते देखे जा सकते है।
 यद्यपि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने इनकी सौंगंध पूरी करवाने के लिए प्रतीक रूप में चित्तौड़ विजय करवा कर इनकी भीष्म प्रतिज्ञा पूरी करवाई। आज विभिन्न सरकारों द्वारा इनके पुनर्वास के लिए कई प्रकार की योजनाये संचालित हो रही है किंतु निरक्षरता और पिछड़ेपन के कारण इनको उन सरकारी योजनाओं का कोई भी लाभ नहीं मिल पा रहा है।
सारी बाते अपने स्थान पर है किंतु भारत के इतिहास में इन वीर योद्धाओं की आज भी कही उल्लेख नहीं है।

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