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नया धमाका

1/07/2011

अमरीका और कनाडा में हिन्दुत्व के प्रति बढ़ता आकर्षण


कांग्रेस और सरकार के जो मुखिया "भगवा आतंकवाद" कहकर भारत का अपमान कर रहे हैं उन्हें थोड़ा बाहर भी झांककर देख लेना चाहिए कि जिस हिन्दू और हिन्दुत्व को वे अपनी सत्ता बचाने के लिए बदनाम कर रहे हैं उस हिन्दुत्व का प्रभाव विदेश में कैसा है? हिन्दुओं के प्रति अगाध सम्मान और हिन्दुत्व के प्रति जो श्रद्धा है उसके दर्शन उन्हें हो गए तो संभवत: पश्चाताप करने के लिए बेबस हो जाएंगे।
सम्पूर्ण दुनिया में उन्हें घूमने की आवश्यकता नहीं है। वे केवल कनाडा के नगर वैंकुवर में जाकर हिन्दू होने के प्रति वहां के लोगों की ललक देख लें। हिन्दुत्व के प्रति उनके दिल में कितनी श्रद्धा और आकर्षण है उसकी झलक उन्हें देखने को मिल जाएगी। डगलस टाड का लेख पढ़ लेना ही उनके लिए पर्याप्त होगा। दीपावली के आसपास यह लेख प्रकाशित किया गया था जिसका शीर्षक है जगमगाता वैंकुवर। उन्हीं दिनों अमरीका की प्रसिद्ध पत्रिका "टाइम" ने एक लेख प्रकाशित किया था जिसका शीर्षक था- क्या हम सब हिन्दू बन गए हैं? कनाडा और अमरीका के अखबारों में इस प्रकार के लेखों में हिन्दुत्व सिर चढ़कर बोल रहा है। इसका पहला कारण तो यह है कि
पश्चिमी राष्ट्रों में जो सर्वेक्षण हो रहे हैं उन पर जब एक नजर डालते हैं तो वे धर्म और संस्कृति के मामले में हिन्दू विचारधारा को अधिक महत्व देते हैं। कनाडा के वेस्ट कोस्ट में हजारों योग केन्द्र, ध्यान केन्द्र, शाकाहारी होटल और आयुर्वेदिक स्वास्थ्य केन्द्र खुल गए हैं।
भारत के योग दर्शन ने तो समस्त विश्व को अपने प्रभाव में ले लिया है। खाड़ी देशों के सामान्य नागरिक ही नहीं, बल्कि वहां के शेख और राजा भी आपको सवेरे-सवेरे योग क्रियाएं करते हुए मिल जाएं तो आश्चर्य की बात नहीं। भारत में हमारे योगाचार्यों की भले ही लोग आलोचना करें, लेकिन आचार्य रजनीश, महेश योगी और चिन्मयानंद एवं बाबा रामदेव ने इस मामले में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सार्इं भक्तों और हरे कृष्णा हरे रामा वालों से प्रभावित होकर लाखों लोगों ने हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया है। विदेश में प्रात:काल यदि कोई मीरा, सूर अथवा रसखान के पद गुनगुनाता हुआ मिल जाए तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। हर तीन में दो अमरीकी योग, ध्यान, प्राणायाम और समाधि द्वारा आत्मा और शरीर को अलग-अलग करने की संभावनाओं में विश्वास रखते हैं। अमरीका में ऋग्वेद बहुत बड़ी संख्या में पढ़ा जा रहा है। उपरोक्त बातों को जान लेने के बाद हिन्दुत्व द्रोहियों को यह विचार करना चाहिए कि क्या हिन्दू और हिन्दुत्व आतंकवादी हो सकते हैं? यदि नहीं तो फिर भारत में हो रहे इस हुड़दंग पर विराम लगना चाहिए।
भारत में पिछले कुछ दिनों से सत्ताधारी गलियारों में यह स्वर सुनाई पड़ रहा है कि देश में क्या "भगवा आतंकवाद" तेजी से बढ़ रहा है। आतंकवाद का भी रंग होता है यह दुनिया को पहली बार मालूम पड़ा। भगवा रंग का ध्वज मन्दिरों पर लहराता है और दुनिया छोड़ने वाले साधु-संतों के कपड़ों का रंग अवश्य ही गेरुआ होता है। साम्यवादी क्रांति जहां कहीं हुई उसमें असंख्य लोग मारे गए, लेकिन किसी ने भी उसका नाम लाल आतंकवाद नहीं दिया। भारत का उर्दू मीडिया तालिबान की भत्र्सना करता है, लेकिन उन्होंने भी कभी हरा या सब्ज आतंकवाद की चर्चा नहीं की। सर पर सफेद कफन बांधकर जो लोग किसी आंदोलन में भाग लेते हैं, उनके लिए भी कभी सफेद आतंकवाद शब्द का उपयोग नहीं किया। लेकिन यदि हिन्दू होने के नाते कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करे तो उसे "भगवा आतंकवाद" कहना कहां तक उचित है। इसका प्रारंभ कांग्रेस नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के गृहमंत्री की ओर से हुआ। इसके बाद उनकी कांग्रेस ब्रिागेड ने इसे तोते की तरह रटना शुरू कर दिया और अब हर जगह "भगवा आतंकवाद" शब्द का उपयोग होता है। लेकिन
यदि भगवा रंग आतंकवादी है तो फिर सम्पूर्ण भारत को ही आतंकवादी कहना पड़ेगा, क्योंकि भगवा तो भारत की राष्ट्रीय सांस्कृतिक पहचान है। इस तरह तो "सत्यमेव जयते" और राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में तीन सिंह वाली मूर्ति के साथ-साथ संसद में से वे सभी वस्तुएं हटा लेनी पड़ेंगी जो आज हमारी राष्ट्रीय पहचान हैं। क्योंकि जिन्हें भगवा आतंकवाद दिखाई देने लगा है तब तो उन्हें सब से पहला यही काम करना होगा। झंडे का केसरिया रंग भी क्या उनके शब्दों में आतंकवाद का ही रंग होगा? भारत में चार बड़े कुंभ के मेले आतंकवादियों के मेले हो जाएंगे? क्योंकि कुंभ मेला भारत की सनातन भगवा संस्कृति की विरासत है। भारत में लाखों तीर्थस्थल हैं जहां पहुंचने के लिए जनता उमड़ती रहती है। हमारी यात्राएं राम मंदिर से लेकर दक्षिण में आइप्पन की जात्रा तक पहुंचती है। यही कामख्या से निकलकर सोमनाथ तक पहुंचती है। मार्ग में आपको शिरडी और पंढरपुर जाने वाली भगवाधारी यात्रा मिल जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। संक्षेप में कहा जाए तो 80 प्रतिशत भारतीयों के शरीर पर भगवा दिखाई पड़े तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। अब सवाल यह है कि क्या भारत की 80 प्रतिशत जनता आतंकवादी है? चुनाव में वोट देने के लिए तो यही जनता पहुंचती है। यानी इस समय जो देश में राज कर रहे हैं वे भगवाधारियों के वोट की कृपा से ही सत्ता में आए हैं। क्या यह अर्थ माना जाए इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि सोनिया पार्टी की सरकार जो अभी सत्ता में है वह "भगवा आतंकवादियों" के वोट से चुनी हुई है? जिस भगवा ने उन्हें दिल्ली दरबार के दर्शन करवाए उसी को ये शासक आतंकवादी कह रहे हैं! वे किस मिट्टी के बने होंगे इस पर विचार कर लेना चाहिए। मतदाता कह रहा है हमने तो वोट दिया, लेकिन हमारी ही आस्था पर डाका डाल रहे हो, इसका विचार तो तुमने अवश्य किया ही होगा।
कांग्रेस की अध्यक्षा से पूछा जाना चाहिए कि आपने एक ऐसे हिन्दुस्थानी नागरिक से विवाह क्यों किया जो भगवा संस्कृति में पला-बढ़ा? राहुल गांधी को यदि इतिहास का पता हो तो भी उनके दादा श्री फिरोज गांधी के पारसी पूर्वज ईरान से भारत आए थे और जिन्होंने भारत में शरण ली। फिरोज गांधी ने तो इस प्रकार की बेतुकी बात नहीं की। राहुल गांधी को अवश्य ही इस बात का जवाब देना चाहिए कि फिर "भगवाधारी हिन्दू आतंकवादियों" के देश में पारसियों को शरण लेने की आवश्यकता क्यों पड़ी? यदि फिरोज गांधी आज जीवित होते तो निश्चित ही अपने पोते की इस बचकाना हरकत पर माथा पीट लेते। भारत की जो सरकार और कांग्रेस के मुखिया इस देश के करोड़ों हिन्दुओं को खुले आम "आतंकवादी" कह रहे हैं, इसलिए उन्हें फैसला कर लेना चाहिए कि क्या उन्हें "आतंकवादी हिन्दुओं" के देश पर राज करना चाहिए? अपने ही देश को जो लोग खुलेआम आतंकवादियों का देश कह रहे हैं, वहां की जनता को क्या इस प्रकार के मुट्ठी भर लोगों को बर्दाश्त करना चाहिए? देशवासियों का और देश का इससे बड़ा अपमान नहीं हो सकता है?

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