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नया धमाका

10/31/2011

जम्मू - कश्मीर समस्या पर सरदार पटेल व नेहरू में मतभेद

राष्ट्र-निर्माता लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल 'लौह पुरुष के नाम से विख्यात सरदार पटेल को भारत के गृह मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान कश्मीर के संवेदनशील मामले को सुलझाने में कई गंभीर मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। उनका मानना था कि कश्मीर मामले को संयुक्त राष्ट्र में नहीं ले जाना चाहिए था। वास्तव में सयुक्त राष्ट्र में ले जाने से पहले ही इस मामले को भारत के हित में सुलझाया जा सकता था। हैदराबाद रियासत के संबंध में सरदार पटेल समझौते के लिए भी तैयार नहीं थे। बाद में लॉर्ड माउंटबेटन के आग्रह पर ही वह 20 नवंबर, 1947 को निजाम द्वारा बाह्म मामले भारत रक्षा एवं संचार मंत्रालय भारत सरकार को सौंपे जाने की बात पर सहमत हुए। हैदराबाद के भारत में विलय के प्रस्ताव को निजाम द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने पर अतंत: वहाँ सैनिक अभियान का नेतृत्व करने के लिए सरदार पटेल ने जनरल जे.एन. चौधरी को नियुक्त करते हुए शीघ्रातिशीघ्र कार्यवाई पूरी करने का निर्देश दिया। सैनिक हैदराबाद पहुँच गए और सप्ताह भर में ही हैदराबाद का भारत में विधिवत् विलय कर लिया गया।
यदि सरदार पटेल को कश्मीर समस्या सुलझाने की अनुमति दी जाती, जैसा कि उन्होंने स्वयं भी अनुभव किया था, तो हैदराबाद की तरह यह समस्या भी सोद्देश्यपूर्ण ढंग से सुलझ जाती। एक बार सरदार पटेल ने स्वयं श्री एच.वी.कामत को बताया था कि ''यदि जवाहरलाल नेहरू और गोपालस्वामी आयंगर कश्मीर मुद्दे पर हस्तक्षेप न करते और उसे गृह मंत्रालय से अलग न करते तो मैं हैदराबाद की तरह ही इस मुद्दे को भी आसानी से देश-हित में सुलझा लेता।
हैदराबाद के मामले में भी जवाहरलाल नेहरू सैनिक काररवाई के पक्ष में नही थे। उन्होंने सरदार पटेल को यह परामर्श दिया-''इस प्रकार से मसले को सुलझाने में पूरा खतरा और अनिश्चितता है।'' वे चाहते थे कि हैदराबाद में की जानेवाली सैनिक काररवाई को स्थगित कर दिया जाए। इससे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। प्रख्यात कांग्रेसी नेता प्रो.एन.जी.रंगा की भी राय थी कि विलंब से की गई काररवाई के लिए नेहरू, मौलाना और माउंटबेटन जिम्मेदार हैं। रंगा लिखते हैं कि हैदराबाद के मामले में सरदार पटेल स्वयं अनुभव करते थे कि उन्होंने यदि जवाहरलाल नेहरू की सलाहें मान ली होतीं तो हैदराबाद मामला उलझ जाता; कमोबेश वैसी ही सलाहें मौलाना आजाद एवं लार्ड माउंटबेटन की भी थीं। सरदार पटेल हैदराबाद के भारत में शीघ्र विलय के पक्ष में थे, लेकिन जवाहरलाल नेहरू इससे सहमत नहीं थे। लॉर्ड माउंटबेटन की कूटनीति भी ऐसी थी कि सरदार पटेल के विचार और प्रयासों को साकार रूप देने में विलंब हो गया।
सरदार पटेल के राजनीतिक विरोधियों ने उन्हें मुसलिम वर्ग के विरोधी के रूप में वर्णित किया; लेकिन वास्तव में सरदार पटेल हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए संघर्षरत रहे। इस धारणा की पुष्टि उनके विचारों एवं कार्यों से होती है। यहाँ तक कि गांधीजी ने भी स्पष्ट किया था कि ''सरदार पटेल को मुसलिम-विरोधी बताना सत्य को झुठलाना है। यह बहुत बड़ी विडंबना है।'' वस्तुत: स्वतंत्रता-प्राप्ति के तत्काल बाद अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय में दिए गए उनके व्याख्यान में हिंदू-मुसलिम प्रश्न पर उनके विचारों की पुष्टि होती है।
इसी प्रकार, निहित स्वार्थ के वशीभूत होकर लोगों ने नेहरू और पटेल के बीच विवाद को बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया तथा जान-बूझकर पटेल व नेहरू के बीच परस्पर मान-सम्मान और स्नेह की उपेक्षा थी। इन दोनों दिग्गज नेताओं के बीच एक-दूसरे के प्रति आदर और स्नेह के भाव उन पत्रों से झलकते हैं, जो उन्होंने गांधीजी की हत्या के बाद एक-दूसरे को लिखे थे। निस्संदेह, सरदार पटेल की कांग्रेस संगठन पर मजबूत पकड़ थी और नेहरूजी को वे आसानी से (वोटों से) पराजित कर सकते थे। लेकिन वे गांधीजी की इच्छा का सम्मान रखते हुए दूसरे नंबर पर रहकर संतुष्ट थे। उन्होंने राष्ट्र के कल्याण को सर्वोपरि स्थान दिया।
विदेश नीति के संबंध में सरदार पटेल के विचारों के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी हैं, जो उन्होंने मंत्रिमंडल की बैठकों में स्पष्ट रूप से व्यक्त किए थे तथा पं.नेहरू पर लगातार दबाव डाला कि राष्ट्रीय हित में ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का सदस्य बनने से भारत को मदद मिलेगी। जबकि नेहरू पूर्ण स्वराज पर अड़े रहे, जिसका अर्थ था-राष्ट्रमंडल से किसी भी प्रकार का नाता न जोडऩा। किंतु फिर भी, सरदार पटेल के व्यावहारिक एवं दृढ़ विचार के कारण नेहरू राष्ट्रमंडल का सदस्य बनने के लिए प्रेरित हुए। तदनुसार समझौता किया गया, जिसके अंतर्गत भारत गणतंत्रात्मक सरकार अपनाने के बाद राष्ट्रमंडल का सदस्य रहा।
सरदार पटेल चीन के साथ मैत्री तथा 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के विचार से सहमत नहीं थे। इस विचार के कारण गुमराह होकर नेहरूजी यह मानने लगे थे कि यदि भारत तिब्बत मुद्दे पर पीछे हट जाता है तो चीन और भारत के बीच स्थायी मैत्री स्थापित हो जाएगी। विदेश मंत्रालय के तत्कालीन महासचिव श्री गिरिजाशंकर वाजपेयी भी सरदार पटेल के विचारों से सहमत थे। वे संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन के दावे का समर्थन करने के पक्ष में भी नहीं थे। उन्होंने चीन की तिब्बत नीति पर एक लंबा नोट लिखकर उसके दुष्परिणामों से नेहरू को आगाह किया था। सरदार पटेल को आशंका थी कि भारत की मार्क्सवादी पार्टी की देश से बाहर साम्यवादियों तक पहुँच होगी, खासतौर से चीन तक। अन्य साम्यवादी देशों से उन्हें हथियार एवं साहित्य आदि की आपूर्ति भी अवश्य होती होगी। वे चाहते थे कि सरकार द्वारा भारत के साम्यवादी दल तथा चीन के बारे में स्पष्ट नीति बनाई जाए।

इसी प्रकार, भारत की आर्थिक नीति के संबंध में सरदार पटेल के स्पष्ट विचार थे। मंत्रिमंडल की बैठकों में उन्होंने नेहरूजी के समक्ष अपने विचार बार-बार रखे; लेकिन किसी-न-किसी कारणवश उनके विचारों पर अमल नहीं किया गया। उदाहरण के लिए उनका विचार था कि समुचित योजना तैयार करके उदारीकरण की नीति अपनाई जानी चाहिए। आज सोवियत संघ पर आधारित नेहरूवादी आर्थिक नीतियों के स्थान पर जोर-शोर से उदारीकरण की नीति ही अपनाई जा रही है।
खेद की बात है कि सरदार पटेल को सही रूप में नहीं समझा गया। उनके ऐसे राजनीतिक विरोधियों के हम शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने निरंतर उनके विरुद्ध अभियान चलाया तथा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया, जिससे पटेल को अप्रत्यक्ष रूप से सम्मान मिला। समाजवादी विचारधारा के लोग नेहरू को अपना अग्रणी नेता मानते थे। उन्होंने पटेल की छवि पूँजीवाद के समर्थक के रूप में प्रस्तुत की। लेकिन सौभाग्यवश, सबसे पहले समाजवादियों ने ही यह महसूस किया था कि उन्होंने पटेल के बारे में गलत निर्णय लिया है।
प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे महत्त्वपूर्ण तथा संवेदनशील मुद्दों पर विचार करने का प्रयास किया गया है, जो आज भी विवादग्रस्त हैं। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.राजेन्द्र प्रसाद ने मई 1959 में लिखा था-''सरदार पटेल की नेतृत्व-शक्ति तथा सुदृढ़ प्रशासन के कारण ही आज भारत की चर्चा हो रही है तथा विचार किया जा रहा है।'' आगे राजेन्द्र प्रसाद ने यह जोड़ा-''अभी तक हम इस महान् व्यक्ति की उपेक्षा करते रहे हैं।'' उथल-पुथल की घडिय़ों में भारत में होनेवाली गतिविधियों पर उनकी मजबूत पकड़ थी। यह 'पकड़' उनमें कैसी आई ? यह प्रश्न पटेल की गाथा का एक हिस्सा है।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के चुनाव के पच्चीस वर्ष बाद चक्रवर्ती राज-गोपालाचारी ने लिखा-''निस्संदेह बेहतर होता, यदि नेहरू को विदेश मंत्री तथा सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता। यदि पटेल कुछ दिन और जीवित रहते तो वे प्रधानमंत्री के पद पर अवश्य पहुँचते, जिसके लिए संभवत: वे योग्य पात्र थे। तब भारत में कश्मीर, तिब्बत, चीन और अन्यान्य विवादों की कोई समस्या नहीं रहती।'' लेकिन निराशाजनक स्थिति यह रही कि उनके निधन के बाद सत्ताहीन राजनीतिज्ञों ने उनकी उपेक्षा की और उन्हें वह सम्मान नहीं दिया गया, जो एक राष्ट्र-निर्माता को दिया जाना चाहिए था।
गृहमंत्री, सूचना एवं प्रसारण मंत्री तथा राज्यों संबंधी मामलों के मंत्री होने के नाते सरदार पटेल स्वाभाविक रूप से जम्मू व कश्मीर मामले भी देखते थे। किंतु बाद में जम्मू व कश्मीर संबंधी मामले प्रधानमंत्री स्वयं देखने लगे। जम्मू व कश्मीर के प्रमुख नेता शेख अब्दुल्ला से प्रधानमंत्री पं.नेहरू के भावनात्मक संबंध थे। हैदराबाद के संबंध में निजाम द्वारा भारत सरकार की अति उदार शर्तें मानने से इनकार करने के बाद सरदार पटेल के पास सैन्य काररवाई के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प शेष नहीं बचा था। हैदराबाद राज्य की जनता उत्तरदायी सरकार हेतु हैदराबाद के भारतीय संघ में विलय की माँग कर रही थी। इस राज्य की आंतरिक व बाह्म शक्तियों के भारत के हित के प्रतिकूल विचारों पर सरदार पटेल का पत्र-व्यवहार काफी प्रकाश डालता है।
जम्मू व कश्मीर एक सामरिक महत्त्व का राज्य था, जिसकी सीमाएँ कई देशों से जुड़ी हुई थीं, और सरदार पटेल उत्सुक थे कि उसका भारत में विलय हो जाए। किंतु भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन के चर्चिल व टोरी पार्टी से काफी मित्रतापूर्ण संबंध थे। वे कश्मीर के पाकिस्तान के साथ मिलने के विरुद्ध नहीं थे। उनका यह आश्वासन अत्यंत ही रोचक है कि यदि कश्मीर पाकिस्तान के साथ विलय करना चाहे तो भारत कोई समस्या खड़ी नहीं करेगा। यद्यपि सरदार पटेल इस प्रकार के आश्वासन के विरुद्ध थे, किंतु युक्तियुक्त योजना के कारण वे उस समय कुछ न बोल सके। फिर भी वह कश्मीर का भारत में विलय चाहते थे। उन्होंने महाराजा हरि सिंह से कहा कि उनका हित भारत के साथ मिलने में है और इसी विषय पर उन्होंने जम्मू व कश्मीर के प्रधानमंत्री पं.रामचंद्र काक को 3 जुलाई, 1947 को एक पत्र लिखा-''मैं कश्मीर की विशेष कठिनाइयों को समझता हूँ, किंतु इतिहास एवं पारंपरिक रीति-रिवाजों आदि को ध्यान में रखते हुए मेरे विचार से जम्मू व कश्मीर के भारत में विलय के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प ही नहीं है।''
उन्होंने महाराजा के इस भय को दूर करना चाहा, जिस पर उन्होंने उसी दिन के अपने पत्र में चर्चा की थी-''पं.नेहरू कश्मीर के हैं। उन्हें इस पर गर्व है, वह आपके शत्रु कभी नहीं हो सकते।'' उन्होंने और भी जोर देकर कहा कि राज्य का हितैषी होने के कारण मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि कश्मीर का हित अविलंब भारत में विलय तथा संविधान सभा में भाग लेने से ही है। उनके मस्तिष्क में यह साफ एवं स्पष्ट था कि कश्मीर समस्या अलग प्रकार की है। जम्मू में हिंदू बहुसंख्यक थे; कश्मीर घाटी में भी हिंदू काफी संख्या में थे; परंतु घाटी में अधिक संख्या मुसलमानों की थी तथा लद्दाख में बौद्ध बहुमत में थे। कश्मीर घाटी में मुसलिम बहुसंख्यक थे, किंतु वे वंश एवं भाषा के आधार पर पंजाब तथा शेष पाकिस्तान के मुसलिमों से भिन्न थे।
फिर भी महाराजा हरि सिंह लंबित रेडक्लिप अवार्ड के कारण असमंजस में थे, क्योंकि गुरदासपुर जिला, जिसकी पूरी सीमा कश्मीर राज्य तथा भावी भारतीय संघ से मिलती थी, पाकिस्तान में मिला लिया गया था और यदि इसे स्वीकार कर लिया गया तो इसका मतलब होगा हिमालय की ऊंची पहाडिय़ों के अतिरिक्त जम्मू और कश्मीर तथा भारत की सीमाएँ कहीं भी परस्पर नहीं मिलेंगी।
इस बीच चतुर महाराजा परिस्थितियों से लाभ उठाने के उद्देश्य से यह भी सोच रहे थे कि अपनी रियासत को स्वतंत्र घोषित कर लें। उन्होंने लॉर्ड माउंटबेटन को अपने मंतव्य से परिचित कराना चाहा और उनके 26 सितंबर, 1947 के पत्र में दिए गए सुझाव को मानते हुए कहा कि कश्मीर की सीमाएँ सोवियत रूस व चीन से भी मिलती हैं और भारत तथा पाकिस्तान से भी, अत: उसे स्वतंत्र राज्य माना जाए। संभवत: यह दोनों देशों (भारत-पाकिस्तान) तथा अपने राज्य के हित में रहेगा-यदि उसे स्वतंत्र रहने दिया जाए। इस प्रकार वह अपना काम निकालने की प्रतीक्षा में थे।
यद्यपि जवाहरलाल नेहरू के पूर्वजों ने कई पीढिय़ों पहले ही कश्मीर छोड़ दिया था, फिर भी वे स्वयं को कश्मीरी मानते हुए उस राज्य तथा नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला से भावनात्मक संबंध रखते थे। अखिल भारतीय राज्य प्रज्ञा परिषद् के अध्यक्ष होने के नाते जवाहरलाल नेहरू ने राज्य में एक उत्तरदायी सरकार की माँग का समर्थन किया तथा शेख अब्दुल्ला को बंदी बनानेवाले महाराजा हरि सिंह की भर्त्सना की। उन्होंने जून 1946 में राज्य प्रज्ञा परिषद् के आंदोलन को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से राज्य का दौरा करना चाहा, जिसका महाराजा ने निषेध कर दिया था।
पं.नेहरू ने निषेधाज्ञा का उल्लंघन करना चाहा, किंतु सरदार पटेल और कांग्रेसी कार्यकारिणी समिति के अन्य सदस्य उस समय नियमोल्लंघन के पक्ष में नहीं थे। यहाँ तक कि कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना आजाद ने भी नेहरू को ऐसा न करने का परामर्श दिया। सरदार पटेल ने अपने विचार स्पष्ट किए कि उन दोनों (गांधी व नेहरू) में से कोई भी वहाँ न जाए। किंतु पं. नेहरू के वहाँ जाने के उद्देश्य के पूरा न होने से कहीं मानसिक तनाव न बढ़े, इस कारण पटेल ने फिर उनमें से एक को ही जाने की राय दी। उन्होंने बहुत दक्षता से कहा, ''इन दो-दो हानिकर बुराइयों में से एक को चुनने के सवाल पर मैं सोचता हूँ कि गांधीजी के जाने से हानि कम होगी।''
11 जुलाई, 1946 को अपने पत्र में सरदार पटेल ने डी.पी. मिश्रा को लिखा-
उन्होंने (नेहरू) हाल ही में ऐसी बहुत सी बातें कही हैं, जिनसे जटिल उलझनें पैदा हुई हैं। कश्मीर के संदर्भ में उनकी गतिविधियाँ, संविधान सभा में सिख चुनाव में हस्तक्षेप, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन के तुरंत बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाना-ये सभी कार्य भावनात्मक पागलपन के थे और इनसे हम सभी को इन मामलों को हल करने में बहुत ही तनावपूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ा था। किंतु इन सभी निष्कलंक एवं अविवेकपूर्ण बातों को उनके स्वतंत्रता-प्राप्ति के आवेश का असामान्य उत्साह माना जा सकता है।
महाराजा हरि सिंह के साथ तनावपूर्ण संबंध होने के कारण पं.नेहरू को भारतीय संघ में विलय हेतु महाराजा के साथ बातचीत करने के लिए सरदार पटेल पर निर्भर रहना पड़ता था। इस बात पर वह बिलकुल असहाय से थे। 27 सितंबर, 1947 को पं.नेहरू ने सरदार पटेल को ध्यान दिलाया कि पंजाब के उत्तरी-पश्चिमी सीमाप्रांत के मुसलिम कश्मीर में घुसपैठ की तैयारियाँ कर रहे हैं। उनकी योजना अक्तूबर के अंत या नवंबर के आरंभ में युद्ध छेडऩे की है। वास्तव में तब हवाई मार्ग से किसी प्रकार का सहयोग देना कठिन होगा। उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें उस स्थिति में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्ववाली नेशनल कॉन्फ्रेंस पर निर्भर रहना पड़ेगा। उन्होंने कश्मीर राज्य के भारत में शीघ्र विलय की आवश्यकता बताई, जिसके बिना शीतकाल शुरू होने से पूर्व भारत के लिए कुछ भी करना दुष्कर होगा। जवाहरलाल नेहरू ने सरदार पटेल को यह भी बताया कि उन्होंने कश्मीर के प्रधानमंत्री मेहर चंद महाजन को भी परिस्थिति से अवगत करा दिया है, किंतु अभी उनके मन की बात का पता नहीं चल सका है। उन्होंने पटेल से कहा कि ''महाराजा व महाजन के लिए आपका परामर्श स्वाभाविक रूप से अधिक प्रभावी रहेगा।''
एक कुशल राजनीतिज्ञ होने के नाते सरदार पटेल ने महाराजा हरि सिंह के साथ अच्छे संबंध बनाए थे और उन्हीं की सलाह से महाराजा ने महाजन को-जो उस समय पंजाब उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश थे-रामचंद्र काक की जगह प्रधानमंत्री नियुक्त किया था।
इस बीच पाकिस्तानी सेना के नेतृत्व में कबायलियों द्वारा बड़ी संख्या में घुसपैठ के कारण कश्मीर की स्थिति ने नाटकीय मोड़ ले लिया था। महाराजा ने राजनीतिक बंदियों-शेख अब्दुल्ला एवं अन्य को-मुक्त कर दिया था। शेख अब्दुल्ला ने अपनी ओर से महाराजा के प्रति पूरी निष्ठा एवं सहयोग का वचन दिया।
पठानकोट के भारतीय संघ में विलय से रेडक्लिफ अवार्ड के अनुसार जम्मू व कश्मीर राज्य का भारत से सीधा संपर्क हो गया। सरदार पटेल महाराजा हरि सिंह व प्रधानमंत्री महाजन को मनाने में सफल रहे कि इन परिस्थितियों में उनके पास भारतीय संघ में विलय के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है।
27 अक्तूबर, 1947 के अपने पत्र में माउंटबेटन ने कश्मीर के महाराजा को लिखा कि बाद में भारत सरकार राज्य में कानून व व्यवस्था स्थापित होने और घुसपैठियों को खदेडऩे के बाद अपनी नीति के अनुसार इस राज्य के भारत में विलय के प्रस्ताव को राज्य की प्रज्ञा की इच्छा कहकर अंतिम रूप देकर इसे भारत में मिला लेगी। 27 अक्तूबर के ही एक अन्य पत्र में माउंटबेटन ने सरदार पटेल को एक ब्रिटिश अधिकारी के विचारों से अवगत कराया कि आंदोलन बहुत ही सुदृढ़ता से आयोजित किया गया है, पूर्व आई.एन.ए.अधिकारी इसमें सम्मिलित हैं और श्रीनगर पर नियंत्रण के लिए (उदाहरणार्थ-उपायुक्त नामित किया गया है) उसी ओर बढ़ रहे हैं और मुसलिम लीग भी इसमें सम्मिलित है। समाचार यह भी मिला था कि पाकिस्तानी हमलावरों ने कुछ क्षेत्र पर अधिकार कर लिया है और आगे बढ़ रहे है। भारत सरकार ने इसपर अपनी सेना को कश्मीर भेजने का निर्णय लिया। फिर भी ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ सर राय बुकर कश्मीर में सेना भेजने के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि दो मुहिमों-कश्मीर व रेडक्लिफ-पर भिडऩा कठिन होगा।
एस.गोपाल ने अपनी पुस्तक 'जवाहरलाल नेहरू की आत्मकथा' में सरदार पटेल की भूमिका को कम दरशाते हुए इस बात पर जोर दिया कि कश्मीर में सेना भेजने का निर्णय मंत्रिमंडल का था। यद्यपि यह तथ्यों के विपरीत था। लगभग सारा मंत्रिमंडल अनिर्णय की स्थिति में था और यह सरदार पटेल ही थे, जिन्होंने सेनाध्यक्ष तथा अन्य लोगों की इच्छा के विरुद्ध श्रीनगर में सेना भेजने का निर्णय लिया।
राज्य में सेना भेजने के निर्णय पर बक्शी गुलाम मोहम्मद, जो उस समय शेख अब्दुल्ला के प्रमुख सहायक थे, ने सरदार पटेल की भूमिका पर दिलचस्प प्रकाश डाला। दिल्ली में होनेवाली उस निर्णयात्मक बैठक में बक्शी गुलाम मोहम्मद उपस्थित थे। जब निर्णय लिया गया, उस संबंध में उन्होंने अपने विचारों को अभिलिखित किया है-
लॉर्ड माउंटबेटन ने बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में सम्मिलित होनेवालों में थे-पंडितजी (जवाहलाल नेहरू), सरदार वल्लभभाई पटेल, रक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह, जनरल बुकर, कमांडर-इन-चीफ जनरल रसेल, आर्मी कमांडर तथा मैं। हमारे राज्य में सैन्य स्थिति तथा सहायता को तुरंत पहुँचाने की संभावना पर ही विचार होना था। जनरल बुकर ने जोर देकर कहा कि उनके पास संसाधन इतने थोड़े हैं कि राज्य को सैनिक सहायता देना संभव नहीं। लॉर्ड माउंटबेटन ने निरुत्साहपूर्ण झिझक दरशाई। पंडितजी ने तीव्र उत्सुकता एवं शंका प्रकट की। सरदार पटेल सबकुछ सुन रहे थे, किंतु एक शब्द भी नहीं बोले। वह शांत व गंभीर प्रकृति के थे; उनकी चुप्पी पराजय एवं असहाय स्थिति, जो बैठक में परिलक्षित हो रही थी, के बिलकुल विपरीत थी। सहसा सरदार अपनी सीट पर हिले और तुरंत कठोर एवं दृढ़ स्वर से सबको अपनी ओर आकर्षित किया। उन्होंने अपना विचार व्यक्त किया-''जनरल हर कीमत पर कश्मीर की रक्षा करनी होगी। आगे जो होगा, देखा जाएगा। संसाधन हैं या नहीं, आपको यह तुरंत करना चाहिए। सरकार आपकी हर प्रकार की सहायता करेगी। यह अवश्य होना और होना ही चाहिए। कैसे और किसी भी प्रकार करो, किंतु इसे करो।'' जनरल के चेहरे पर उत्तेजना के भाव दिखाई दिए। मुझमें आशा की कुछ किरण जगी। जनरल की इच्छा आशंका जताने की रही होगी, किंतु सरदार चुपचाप उठे और बोले, ''हवाई जहाज से सामान पहुँचाने की तैयारी सुबह तक कर ली जाएगी।'' इस प्रकार कश्मीर की रक्षा सरदार पटेल के त्वरित निर्णय, दृढ़ इच्छाशक्ति और विषम-से-विषम परिस्थिति में भी निर्णय के कार्यान्वयन की दृढ़ इच्छा का ही परिणाम थी।
सरदार पटेल के राजनीतिक विरोधियों द्वारा उनके बारे में समय-समय पर यह दुष्प्रचारित किया गया कि वे मुसलमान-विरोधी थे। किंतु वास्तविकता इसके विपरीत थी। उन पर यह आरोप लगाना न्यायसंगत नहीं होगा और इतिहास को झुठलाना होगा। सच्चाई यह थी कि हिंदुओं और मुसलमानों को एक साथ लाने के लिए सरदार पटेल ने हरसंभव प्रयास किए। इतिहास साक्षी है कि उन्होंने कई ऊँचे-ऊँचे पदों पर मुस्लमानों की नियुक्ति की थी। वह देश की अंतर्बाह्य सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे और इस संबंध में किसी तरह का जोखिम लेना उचित नहीं समझते थे। पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान (अब बँगलादेश) से भागकर आए शरणार्थियों के प्रति सरदार पटेल का दृष्टिकोण अत्यंत सहानुभूतिपूर्ण था। उन्होंने शरणार्थियों के पुनर्वास एवं उनकी सुरक्षा हेतु कोई कसर बाकी न रखी और हरसंभव आवश्यक कदम उठाए।
'सरदार पटेल सोसाइटी' के संस्थापक एवं यूनाइटेड नेशनल कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष श्री एस. निजलिंगप्पा ने अपनी जीवनी 'माइ लाइफ ऐंड पॉलिटक्स' (उनकी मृत्यु के कुछ माह पश्चात् प्रकाशित) में लिखा था-
''......आश्चर्य होता है कि पं. नेहरू से लेकर अब तक कांग्रेसी नेताओं को उनकी जीवनियाँ तथा संगृहीत चुनिंदा कार्यों को छपवाकर स्मरण किया जाता है। उनकी प्रतिमाएँ लगाई जाती हैं तथा उनके नामों पर बड़ी-बड़ी इमारतों के नाम रखे जाते हैं। लेकिन सरदार पटेल के नाम की स्मृति में ऐसा कुछ नहीं किया गया। जब हम सरदार पटेल की उपलब्धियों पर विचार करते हैं तो गांधी जी को छोड़कर अन्य कोई नेता उनके समकक्ष नहीं ठहरता। मेरा आशय अन्य नेताओं की समर्पित सेवाओं की प्रतिष्ठा को नीचा दिखाना नहीं है; लेकिन सरदार पटेल की सेवाएँ सर्वोपरि हैं।
''पिछले आठ वर्षों से मैं तत्कालीन प्रधानमंत्री से भी बार-बार अनुरोध करता रहा कि इस सोसायटी को उचित स्तर की इमारत दी जाए। हम वहाँ पर सरदार पटेल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व संबंधी विशेषताओं को प्रदर्शित करना चाहते हैं। यह सोसायटी एक पुस्तकालय बनवाना चाहती है तथा बैठकों के आयोजन की व्यवस्था करना चाहती है। लेकिन आज तक इस दिशा में कुछ नहीं किया गया, जबकि प्रत्येक प्रधानमंत्री को इस बारे में असंख्य पत्र लिखे और अनेक बार अपील की गई।''
सरदार पटेल से मतभेद रखनेवाले तथा उनके राजनीतिक विरोधियों ने निहित स्वार्थोंवश उनकी ऐसी छवि बनाई है कि वे मुसलिम-विरोधी थे तथा उनके प्रति भेदभाव बरतते थे। यहाँ यह ध्यातव्य है कि नीतिगत एवं महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर पं. जवाहरलाल नेहरू तथा वल्लभभाई पटेल के बीच मतभेद थे।
राष्ट्रवादी मुसलिम जवाहरलालजी के समर्थक थे तथा कई मुसलिम नेता उनके घनिष्ठ मित्र थे। मौलाना आजाद, रफी अहमद किदवई, शेख अब्दुल्ला, डॉ. सईद मदमूद, आसफ अली तथा अन्य नेता पं. नेहरू के घनिष्ठ मित्रों में थे; जबकि वल्लभभाई पटेल के साथ उनके औपचारिक संबंध ही थे।
दूसरी ओर, वल्लभभाई पटेल अकेले थे तथा उनके बहुत कम मित्र थे। उन्होंने कुछ महत्त्वपूर्ण लोगों के साथ ही संबंध रखे थे। इसमें राजेन्द्र प्रसाद, जी.बी. पंत, पी.डी. टंडन, मोरारजी देसाई, जमनालाल बजाज तथा कुछ गुजराती लोगों के नाम शामिल किए जा सकते हैं। कुछ निचली श्रेणी के नेताओं अथवा विरोधी नेताओं ने, जिनमें कुछ वामपंथी भी शामिल थे। (जैसे- के.डी. मालवीय, अशरफ, अरुणा आसफ अली, मृदुला साराभाई, पद्मजा नायडू), नेहरू के समक्ष मुसलमानों के प्रति पटेल के वैमनस्यपूर्ण रवैए के बारे में मनगढ़ंत कहानियाँ सुनाते रहते थे। इनमें से अधिकांश मुसलिम निस्संदेह मुसलिम लीग की पाकिस्तान बनाने की मांग के समर्थक थे। जब कभी चुनाव हुए, उन्होंने पाकिस्तान के लिए ही मत दिया। यह आम धारणा है कि सरदार पटेल कांग्रेस के तीन दिग्गजों-महात्मा गाँधी, पं. नेहरु और सुभाषचंद्र बोस के खिलाफ थे। किंतु यह मात्र दुष्प्रचार ही है। हाँ, कुछ मामलों में-खासकर सामरिक नीति के मामलों में-उनके बीच कुछ मतभेद जरुर थे, पर मनधेद नहीं होता था।
सरदार पटेल ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए दिए जाने के प्रस्ताव पर गाँधीजी का विरोध नहीं किया था; यद्यपि वह समझ गए थे कि ऐसा करने की कीमत चुकानी पड़ेगी। इसी तरह उन्होंने प्रधानमंत्री के रुप में पं. नेहरु के प्रति भी उपयुक्त सम्मान प्रदर्शित किया। उन्होंने ही भारत को ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल में शामिल करने के लिए पं. नेहरु को तैयार किया था; यद्यपि नेहरु पूरी तरह इसके पक्ष में नहीं थे। जहाँ सुभाष चंद्र बोस के साथ उनके संबंधों की बात है, वे वरन् सन् 1939 में दूसरी बार सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाने के खिलाफ थे। सुभाषचंद्र बोस ने किस प्रकार सरदार पटेल के बड़े भाई वि_लभाई पटेल-जिनका विएना में निधन हो गया था, के अंतिम संस्कार में मदद की थी, उससे दोनों के मध्य आपसी प्रेम और सम्मान की भावना का पता चलता है।
2 सितंबर, 1946 को सरदार पटेल जब अंतिम सरकार में शामिल हुए, तो उस समय उनकी आयु 71 वर्ष थी। हम भली-भाँति जानते हैं कि गांधीजी की इच्छा का सम्मान करते हुए ही सरदार पटेल ने सन् 1946 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव से अपना नाम वापस ले लिया था, जबकि 15 प्रांतों की कांग्रेस समितियों में से 12 ने उनके नाम का अनुमोदन कर दिया था। यदि उन्हें चुनाव लडऩे दिया जाता, तो निस्संदेह वह स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनते।
गांधीजी के इस निर्णय पर कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने रोष प्रकट किया था। मध्य प्रांत के तत्कालीन गृहमंत्री डी.पी. मिश्र ने सरदार पटेल को लिखे एक पत्र में शिकायत भी की थी कि उनके (पटेल के) कारण ही कांग्रेसी नेताओं ने चुपचाप सबकुछ स्वीकार कर लिया। वस्तुत: सरदार पटेल और उनके समर्थक नेता पद के भूखे नहीं थे, उनके अपने राजनीतिक आदर्श थे, जिन्हें वे किसी भी स्थिति में छोडऩा नहीं चाहते थे।
डी.पी. मिश्र के पत्र के उत्तर में सरदार पटेल ने लिखा था कि पं. नेहरू चौथी बार कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए चुने गए हैं। उन्होंने आगे लिखा था कि पं. नेहरू अकसर बच्चों जैसी नादानी कर बैठते हैं, जिससे हम सभी के सामने बड़ी-बड़ी मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं। इस तरह की कुछ मुश्किलों का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा था, ''कश्मीर में उनके द्वारा किया गया कार्य, संविधान सभा के लिए सिख चुनाव में हस्तक्षेप और अखिल भारतीय कांग्रेस के तुरंत बाद उनके द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस-सभी कार्य उनकी भावनात्मक अस्वस्थता को दरशाते हैं, जिससे इन मामलों को जल्दी-से-जल्दी सुलझाने के लिए हमारे ऊपर काफी दबाव आ जाता है।''
जब पं. नेहरू को मंत्रिमंडल का गठन करने और उसके सदस्यों की सूची भेजने के लिए कहा गया तो उन्होंने अपनी प्रथम सूची में सरदार पटेल को कोई स्थान नहीं दिया था। बाद में जब सरदार पटेल को मंत्रिमंडल में सहायक (उप-प्रधानमंत्री) के रूप में शामिल किया गया तो उन्होंने अपने एक कनिष्ठ सहकर्मी को सहयोग देना सहर्ष स्वीकार कर लिया। पं. नेहरू ने स्वयं भी अहसास किया कि उनका प्रधानमंत्री बनना सरदार पटेल की उदारता के कारण ही संभव हो सका।

सरदार पटेल को उप-प्रधानमंत्री बनाकर उन्हें सबसे महत्त्वपूर्ण विभाग-गृह तथा सूचना एवं प्रसारण-सौंपा गया। बाद में 5 जुलाई, 1947 को एक और महत्त्वपूर्ण विभाग-राज्य मंत्रालय भी उन्हें सौंप दिया गया। वस्तुत: सरदार पटेल कांग्रेस के सबसे सशक्त नेता के रूप में स्थापित थे, लेकिन पं. नेहरू को सूचित किए बिना या उनकी स्वीकृति लिये बिना शायद ही उन्होंने कभी कोई बड़ा फैसला लिया हो। अपनी अद्भुत सगंठन क्षमता और सूझ-बूझ के बल पर उन्होंने देश को विभाजन के बाद की मुश्किलों और अव्यवस्थाओं से उबारने में सफलता प्राप्त की।



यह सच है कि पं. नेहरू के साथ उनके कुछ मतभेद थे, लेकिन ये मतभेद स्वाभाविक थे, जो कुछ विशेष मामलों-खासकर आर्थिक, सामुदायिक और समय-समय पर उठनेवाले संगठनात्मक मामलों-को लेकर ही थे। किंतु दुर्भाग्य की बात है कि कुछ स्वार्थ-प्रेरित तत्त्वों ने उनके इन मतभेदों को गलत अर्थ में प्रस्तुत करके जनता को गुमराह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मणिबेन ने इस संदर्भ में पद्मजा नायडू, मृदुला साराभाई और रफी अहमद किदवई के नामों का उल्लेख किया है, जिन्होंने मौके का भरपूर फायदा उठाने का प्रयास किया था। यहाँ तक कहा गया कि सरदार पटेल पद के भूखे हैं और वह उसे किसी भी कीमत पर छोडऩा नहीं चाहेंगे। गांधीजी को जब इसका पता चला तो उन्होंने सरदार पटेल को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अत्यंत कड़े शब्दों में उनकी शिकायत की थी-


मुझे तुम्हारे खिलाफ कई शिकायतें सुनने को मिली हैं।....तुम्हारे भाषण भड़काऊ होते हैं...तुमने मुसलिम लीग को नीचा दिखाने की कोई कसर नहीं छोड़ रखी।...लोग तो कह रहे हैं कि तुम (किसी भी स्थिति में) पद पर बने रहना चाहते हो।
गांधीजी के इन शब्दों से सरदार पटेल को गहरा आघात लगा। उन्होंने 7 जनवरी, 1947 को गांधीजी को लिखे अपने पत्र में स्पष्ट रूप में उल्लेख किया कि पं. नेहरू ने उन्हें पद छोडऩे के लिए दबाव डालते हुए धमकी दी थी, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया, क्योंकि इससे कांग्रेस की गरिमा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता। अपने ऊपर लगाए गए निराधार आरोपों के संदर्भ में सरदार पटेल ने गांधीजी को बताया कि ये अफवाहें मृदुला द्वारा ही फैलाई गई होंगी, जिन्होंने मुझे बदनाम करने को अपना शौक बना लिया है। वह तो यहाँ तक अफवाह फैला रही हैं कि मैं जवाहरलाल से अलग होकर एक नई पार्टी का गठन करने जा रहा हूँ। इस तरह की बातें उन्होंने कई मौकों पर की हैं। पत्र में उन्होंने यह भी लिखा कि कार्यसमिति की बैठक में भिन्न विचार व्यक्त करने में मुझे कोई बुराई दिखाई नहीं देती। आखिरकार हम सभी एक ही दल के सदस्य हैं। वस्तुत: पं. जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम के साथ सरदार पटेल के जो भी मतभेद थे, वे व्यक्तिगत मामलों को लेकर नहीं, बल्कि सिद्धांतों और नीतियों को लेकर थे। जो लोग उनके मतभेदों के बारे में जानते थे, उन्होंने इसका लाभ उठाते हुए दोनों के बीच खाई खोदने की पूरी कोशिश की।

पं. नेहरू के साथ सरदार पटेल के मतभेद उस समय और गहरा गए, जब गोपालस्वामी आयंगर का हस्तक्षेप कश्मीर मामले के साथ-साथ अन्य मंत्रालयों कार्यों में बढऩे लगा। गोपालस्वामी ने पंजाब सरकार को कश्मीर के लिए वाहन चलाने का निर्देश दे दिया, जिसका सरदार पटेल ने यह तर्क देते हुए विरोध किया कि यह मामला राज्य मंत्रालय के कार्य क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जो उस समय पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के पुनर्वास कार्य में लगे हुए थे, हालाँकि बाद में गोपालस्वामी ने सरदार पटेल के दृष्टिकोण की सराहना की, लेकिन पं. नेहरू किसी भी स्थिति में सरदार पटेल से सहमत नहीं हो पा रहे थे। उन्होंने प्रधानमंत्री की शक्ति का मामला उठाते हुए कड़े शब्दों में सरदार पटेल को लिखा, ''यह सब मेरे ही आग्रह पर किया गया था और मैं उन मामलों से संबंधित अपने अधिकारों को नहीं छोडऩा चाहता, जिनके प्रति मैं स्वयं को उत्तरदायी मानता हूँ।ÓÓ
इसी तरह अजमेर में सांप्रदायिक अशांति के दौरान पहले तो पं. नेहरू ने घोषणा की कि वह स्वयं अजमेर का दौरा करके स्थिति का जायजा लेंगे, लेकिन अपने भतीजे के निधन के कारण वह दौरे पर नहीं जा सके। अत: इसके लिए उन्होंने एक सरकारी अधिकारी एच.आर.वी. आयंगर को नियुक्त कर दिया, जिसने एक पर्यवेक्षक की हैसियत से शहर का दौरा किया। इस दौरान उसने उपद्रव के कारण हुई क्षति का जायजा लिया और दरगाह, महासभा तथा आर्य समाज के प्रतिनिधियों से भेंट की। उसकी गतिविधियों से ऐसा लगा कि उसे अजमेर के मुख्य आयुक्त और उसके अधीनस्थ अधिकारियों के कार्यों की जाँच करने के लिए भेजा गया है। शंकर प्रसाद ने इसकी शिकायत सरदार पटेल (गृहमंत्री) से की, जिसे गंभीरता से लेते हुए सरदार पटेल ने पूरी बात पं. नेहरू के सामने रखते हुए कहा कि यदि वह स्वयं दौरे पर जाने में असमर्थ थे तो वह अपने स्थान पर एक सरकारी अधिकारी को नियुक्त करने की बजाय किसी मंत्री को या स्वयं मुझे नियुक्त कर सकते थे। अपने अधिकारों के संबंध में उठाए गए इस सवाल पर नेहरू ने कड़ा रुख अपनाते हुए विरोध जताया और कहा कि इस तरह तो मैं एक कैदी की तरह हो जाऊँगा, जिसे स्थिति को देखते हुए कोई कार्य करने की स्वतंत्रता न हो। हालाँकि उन्होंने स्वीकार किया कि विभिन्न मामलों पर उनकी सोच और सरदार पटेल की सोच में व्यापक अंतर है।
पं. नेहरू द्वारा गृह और राज्य मंत्रालयों के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप किए जाने के मामले पर भी दोनों के बीच में अकसर मतभेद उभर आते थे। पं. नेहरू की शिकायत होती की कि राज्य मंत्रालय से संबंधित कार्यों की प्रगति की जानकारी मंत्रिमंडल को नियमित रूप से नहीं दी जाती, जबकि सरदार पटेल ने इसका खंडन करते हुए कहा था कि वह सभी नीतिगत मामलों से संबंधित सूचना प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल को नियमित रूप से देते रहने का विशेष ध्यान रखते हैं। त्रिलोकी सिंह और रफी अहमद किदवई ने एक छोटा सा अल्पसंख्यक गुट बनाया था, जो बहुसंख्यकों पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहता था। सरदार पटेल को यह बात बिलकुल पसंद नहीं आई। उन्होंने सुझाव दिया कि इसका निर्णय करने का सबसे अच्छा तरीका सद्भावपूर्ण समझौता है और यदि यह तरीका सफल नहीं होता तो स्थिति को देखते हुए इसका एकमात्र लोकतांत्रिक रास्ता चुनाव कराकर बहुसंख्यक मतों द्वारा इसका निर्धारण करना हो सकता है। त्रिलोकी सिंह को यह बात पसंद नहीं आई और वह अपने छोटे से गुट के साथ कांग्रेस से अलग हो गए। वस्तुत:, रफी अहमद किदवई स्वयं को उत्तर प्रदेश में गोबिंद वल्लभ पंत के प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित करना चाहते थे, क्योंकि वह पं. नेहरू के अधिक निकट थे। बाद में जब उन्हें केंद्र में आने का मौका मिला तो यह निकटता और भी बढ़ गई।

4 जून, 1948 को लिखे एक पत्र में सरदार पटेल ने पं. नेहरू को बताया कि वह उत्तर प्रदेश में चल रही स्थिति से खुश नहीं हैं। पत्र में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा था-''रफी उत्तर प्रदेश की प्रांतीय कांग्रेस समिति के अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ रहे हैं।...केंद्र में एक मंत्री के रूप में रहते हुए उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। उनका गुट संभवत: यही सोच रहा है कि उनके पास कोई अन्य प्रत्याशी ऐसा नहीं है, जो टंडनजी को चुनाव में हरा सके।''
संभवत:, वैचारिक मतभेदों के चलते ही सरदार पटेल ने 16 जनवरी, 1948 को गांधीजी को पत्र लिखकर उनसे अनुरोध किया था कि उन्हें पद से मुक्त कर दिया जाए, हालाँकि पत्र में उन्होंने कारण का उल्लेख नहीं किया था। इससे पूर्व 6 जनवरी, 1948 को पं. नेहरू ने भी गांधीजी को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने अपने और सरदार पटेल के बीच उत्पन्न मतभेदों को विस्तृत करते हुए लिखा था कि या तो सरदार पटेल को अपना पद छोडऩा होगा, नहीं तो मैं स्वयं त्याग-पत्र दे दूँगा। नेहरू द्वारा उठाए गए मामलों पर संक्षिप्त टिप्पणी करते हुए सरदार पटेल ने गांधीजी को पत्र के माध्यम से पुन: स्पष्ट किया था कि उनके बीच हिंदू-मुसलिम संबंधों और आर्थिक मामलों को लेकर कोई मतभेद नहीं है, जैसा प्रधानमंत्री (पं. नेहरू) ने भी स्वीकार किया है, और आखिरकार दोनों के लिए देश का हित ही सर्वोपरि है। उन्होंने आगे स्पष्ट करते हुए लिखा था कि यदि पं. नेहरू की नीतियों को स्वीकार कर लिया जाए तो देश में प्रधानमंत्री की भूमिका एक तानाशाह की हो जाएगी।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपके इस ऐतिहासिक लेख से सरदार पटेल के बारे में ज्यादा जानकारी मिली है । हमारे देश का दुर्भाग्य कि उनके जैसे नेता हमें स्वतंत्रता के बाद ज्यादा दिन मार्गदर्शन न मिल सका ।

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  2. Aapne shi bola, agar Sardar Balabh Bhai Patel hote to, Bharat desh ko koi desh challenge nhi de sakta tha, Pakistan to dur ki chij h....

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