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नया धमाका

7/31/2011

यदि हिन्दू औरत का बलात्कार होता है तो वह अपराध नहीं माना जाएगा ?

1. यदि दंगों के दौरान किसी ‘‘अल्पसंख्यक‘‘ महिला से बलात्कार होता है तो इस बिल में कठोर प्रावधान हैं, जबकि ‘‘बहुसंख्यक‘‘ वर्ग की महिला का बलात्कार होने की दशा में इस कानून में कुछ नहीं है 2. ‘‘अल्पसंख्यक समुदाय‘‘ के किसी सदस्य को इस कानून के तहत सजा नहीं दी जा सकती, भले उसने बहुसंख्यक समुदाय के व्यक्ति के खिलाफ दंगा भडाकने का अपराध किया है (क्योंकि कानून में पहले ही मान लिया गया है कि सिर्फ ‘‘बहुसंख्यक समुदाय‘‘ ही हिंसक और आक्रामक होता है, जबकि अल्पसंख्यक तो अपनी आत्मरक्षा कर रहा होता है)। 3. इस प्रस्तावित विधेयक के अनुसार दंगा हमेशा ‘‘बहुसंख्यकों‘‘ द्वारा ही फैलाया जाता है, जबकि ‘‘अल्पसंख्यक‘‘ हमेशा हिंसा का शिकार होते हैं। 4. कानून-व्यवस्था का मामला राज्य सरकार का है, लेकिन इस बिल के अनुसार यदि केन्द्र को महसूस होता है तो वह साम्प्रदायिक दंगों की तीव्रता के अनुसार राज्य सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप कर सकता है और उसे बर्खास्त कर सकता है। (इसका मोटा अर्थ यह है कि यदि 100-200 कांग्रेसी अथवा 100-50 जेहादी तत्व किसी राज्य में दंगा फैला दें तो राज्य सरकार की बर्खास्तगी आसानी से की जा सकेगी)। ऐसे में केंद्र सरकार अपनी शक्तियों को नाजायज फायदा उठा सकती है, खासकर उन राज्यों में जहां उनके विरोधियों की सरकार शासन चला रही होगी। 5. दंगो के दौरान होने वाले किसी भी तरह के जान माल के नुकसान पर मुवावजे के हकदार सिर्फ अल्पसंख्यक ही होंगे। कोई भी हिंदू दंगे में होने वाले किसी भी तरह के नुकसान पर मुवावजा का हकदार नहीं होगा। 6. किसी विशेष समुदाय (यानी अल्पसंख्यकों) के खिलाफ घृणा फैलाने का अभियान चलाना भी दण्डनीय अपराध है (फेसबुक, ट्वीट और ब्लॉग आदि भी शामिल)। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सांप्रदायिक हिंसा भारतीय लोकतंत्र के चेहरे पर एक बदनुमा दाग है। एनएसी के सदस्यों ने सांप्रदायिक हिंसा विधेयक को हरी झंडी दिखा दी है. इस बिल का आधिकारिक नाम सांप्रदायिक हिंसा एवं लक्षित हिंसा निरोध विधेयक है जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यकों को सांप्रदायिक दंगों के दौरान हत्या या दूसरे अत्याचारों से बचाना होगा। यदि यह विधेयक कानून बन जाता है, तो सांप्रदायिक हिंसा और सांप्रदायिक दुर्भावना फैलाने के लिए केवल हिंदुओं पर ही मुकदमा चलेगा, उन्हें ही दोषी माना जाएगा और सजा भी उन्हीं को होगी. क्योंकि संविधान यह स्वीकार करने से इनकार कर देगा कि मुसलमान और ईसाई हिंसा और घृणा फैलाने में सक्षम हैं। यदि यह विधेयक कानून बन जाता है तो वैधानिक स्वीकारोक्ति हो जाएगी कि दंगे महज हिंदू ही करते हैं और मुस्लिम, ईसाई तथा दूसरे अल्पसंख्यक दंगों के लिए कभी जिम्मेदार नहीं हो है क्योंकि ‘समूह‘, जो इस विधेयक के मसौदे की रीढ़ है, को इस तरह परिभाषित किया गया है कि हिंदुओं पर ही इसकी गाज गिरेगी. इस प्रकार अगर यह प्रस्तावित विधेयक कानून बन जाता है तो भारतीय संविधान यह मान लेगा कि केवल हिंदू ही धार्मिक घृणा भड़काने, उत्तेजना फैलाने और दूसरे धर्मों को बदनाम करने का कृत्य करते हैं। मुसलमान और ईसाई यह कभी नहीं कर सकते. अगर यह विधेयक कानून बन जाता है तो गुजरात में दंगों के लिए सभी आरोपी को तो दोषी साबित किये जा सकते हैं और उन्हें सजा भी सुनाई जा सकती है जबकि गोधरा में ट्रेन यात्रियों की मौत के लिए जिम्मेदार लोगों को हिंदुओं के लिए मात्र सद्भावना की रक्षा के नाम पर परिकल्पित किया जाएगा। यदि यह विधेयक कानून बनता है तो कोई भी गुमनाम शिकायतकर्ता सांप्रदायिक घृणा भड़काने के लिए किसी हिंदू के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज करवा सकता है और पुलिस इसे एक गैर जमानती अपराध के रूप में दर्ज करेगी। बिना यह पता किए कि शिकायतकर्ता कौन है, अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। और, अभियुक्त जो कि हिंदू है उसे यह सब करने का लगभग दोषी मान लिया जाएगा जब तक कि वह अपनी संलिप्तता या अपने को निर्दोष साबित नहीं कर देता है। जैसा की आज प्रज्ञा संध्वी के साथ हो रहा है। एक हिंदू कार्यकर्ता ने कट्टरपंथी ईसाई मिशनरियों के खिलाफ शिकायत की मेरा विश्वास है कि प्रलोभन और रिश्वत के माध्यम से आदिवासियों का धर्म परिवर्तन कराने वालों को सलाखों के पीछे भेजा जाएय मिशनरी ईसाई जो खुले तौर पर हिंदुओं को असभ्य मूर्तिपूजक या काफिर कहते हैं और हिंदू देवताओं की मूर्तियों का अपमान करते हों, उन्हें भारतीय संविधान द्वारा हमेशा ही निर्दोष माना जायेगा। देश में कई जिले ऐसे हैं जहां मुसलमानों या ईसाइयों की आबादी हिंदुओं से भी ज्यादा है। तो फिर सांप्रदायिक हिंसा और दंगों के लिए किसे दोषी ठहराएंगे? भारत धीरे-धीरे और अधिक सौहार्दपूर्ण अन्तर-समुदाय संबंधों की ओर बढ़ रहा है। जब कभी भी छोटी सा साम्प्रदायिक अथवा जातीय दंगा होता है, तो उसकी निंदा हेतु एक राष्ट्रीय विचारधारा तैयार हो जाती है। सरकारें, मीडिया, अन्य संस्थाओं सहित न्यायालय अपना-अपना कर्तव्य निभाने के लिए तैयार हो जाते हैं। निःसंदेह साम्प्रदायिक तनाव या हिंसा फैलाने वालों को दंडित किया जाना चाहिए। हिंसा करने वालों के खिलाफ सख्त कानून होना ही चाहिए, फिर चाहे वे बहुसंख्यक हो या अल्पसंख्यक हो, बीच के भेद को खत्म करना होगा। अगर सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा को रोकने के लिए सरकार बिल बनाना चाहती है तो समाज शास्त्रियों की खुली मीटिंग बुलाएं, वहां जमकर इस मुददे पर बहस हो, और उसके बाद किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाए। एक तरफ फैसला सुनाने से कुछ नहीं होने वाला। इस विधेयक को पास करने से पहले इस बात पर पूर्ण विचार करना जरूरी है कि दंगों में हमेशा आम आदमी पीसता है, वो आम आदमी दोनों में से किसी भी वर्ग का हो सकता है। इस कानून के वजह से हिन्दुओ में मुस्लिमो के प्रति नफरत और बढ़ेगी। मुस्लिम समाज अलग थलग पड़ जाएगा। इससे भारत के मुसलमान कभी भी विकास की मुख्यधारा से नही जुड़ पायेंगे। सिर्फ और सिर्फ गरीबी को ढोते रहेंगे। हाॅ कांग्रेस जैसी पार्टीयो का वोट बैंक जरुर बने रहेंगे। जब भी हिन्दू समाज इस व्यवस्था के विरुध्द वोट करेगा। केंद्र से कांग्रेस आउट हो जायेगी, तब इन अल्पसंख्यको की कौन सुनेगा?
अतः मेरे विचार से मुस्लिम समाज अपना भविष्य भारतवर्ष में बनाना चाहता है तो उसे स्वयं आगे बढ़ कर इस अधिनियम का विरोध करना होगा अन्यथा ये कांग्रेसी मुसलमानों को भारतवर्ष में किसी दर का नही छोड़ेंगे।

3 टिप्‍पणियां:

  1. चलो भाई, अब इस देश का बंटाधार होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा?

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  2. यह विधेयक कभी पास नहीं हो सकता, यह कांग्रेस भी जानती है. सोनिया सलाहकार परिषद ने जो कुटिल नीति खेली है, उसका फौरी स्वार्थ है- उत्तर प्रदेश में अपना वोट बैंक बढ़ाना. उसमे ये राष्ट्रघाती लोग सफल होंगे ही, ऐसी आशा है.

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