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नया धमाका

11/26/2010

आखिर कब दूर होगा भ्रष्टाचार का कुहासा?

देश का वर्तमान माहौल देखकर ऐसा लगता है मानो सरकार से लेकर पत्रकारिता तक सब कुछ बिक्री के लिए उपलब्ध है। निश्चित रूप से यह काफी कड़े शब्द हैं और सामान्य स्थिति में इन शब्दांे का उपयोग अतिरंजित कहा जा सकता है, लेकिन जहां प्रजा की रक्षा और उसे सुशासन देने के लिए सरकार में भेजे गए लोग देश के इतिहास का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार छिपाने में व्यस्त हों तथा जो कलम की सिपाही सरकार से लेकर न्यायपालिका और प्रशासन तक किसी भी क्षेत्र में गलत आचरण पर निर्मम प्रहार करने के लिए तैनात हों, यदि वे स्वयं गलत कामों में लिप्त पाए जाएं तो बचाव का मार्ग कहां मिलेगा? गत सप्ताह अंग्रेजी की एक पत्रिका ‘ओपन‘ में दो वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा सत्ता की दलाली के रास्ते पर चलते हुए जो टेलीफोनिक संवाद छपे हैं, वे चौंकाने वाले हैं। राजनीतिक नेताओं के साथ सम्पर्क के आधार पर एक बड़ी विज्ञापन एजेंसी की सूत्रधार नीरा राडिया से इन संपादकों की फोन पर जो बातचीत टेप करने के बाद छपी है, उसका निष्कर्ष यह निकलता है कि ससंद में कौन बोलेगा? किस विषय पर बोलेगा? केंद्र में मंत्री कौन बनेगा? कौन पत्रकार अपने स्तंभ में किस विषय को किस तरीके से उठाएगा? यह सब पूंजीपति, उनके दलाल, नेताओं के मित्र, पत्रकार, संपादक तय करते हैं। लोकतंत्र का इससे अधिक शर्मनाक पतन और क्या हो सकता है? वे लोग जो चौथे स्तंभ के आधार कहे जाते हैं सत्ता की दलाली के घृणित कर्म में आकंठ डूबे हुए दिखते हैं। पिछले दिनों हरियाणा में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी राठौर पर रूचिका के मानभंग के मामले में आवाज उठायी गयी थी कि उस अधिकारी को जितने अलंकरण और पुरस्कार मिले हैं, वे सब वापिस ले लिए जाएं और ऐसा किया भी गया। जो वरिष्ठ पत्रकार सत्ता की दलाली में लिप्त पाए गए हैं क्या उनको मिले अलंकरण भी वापिस नहीं लिए जाने चाहिए?
वर्तमान समय में पत्रकारिता भयानक कुहासे से गुजर रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आज भी अच्छे पत्रकार और ईमानदार संपादक जिंदा हैं जो भारतीय पत्रकारिता की एक शानदार और उज्ज्वल परम्परा को निभाते हुए कलम के धर्म की रक्षा कर रहे हैं। लेकिन बाजार, विज्ञापन, अधिक पैसा कमाने की लालसा के कारण संपादक खत्म किए जाते हैं और उनकी जगह मार्केटिग एक्जीक्यूटिव ज्यादा प्रभावी हो जाते हैं। पेड न्यूज के बाद राजनेताओं से नेटवर्किंग करते हुए संसद और मंत्रिमंडल को कॉरपोरेट जगत नियंत्रित करने लगता है और इस काम में वरिष्ठ पत्रकार अपने ऐश्वर्य और विलासिता के लिए सहयोग देते हैं। गलत काम कहीं भी हो बख्शा नहीं जाना चाहिए। कर्नाटक के मुद्दे पर भी कांग्रेस कुछ तर्क दे रही है। उन तमाम संदेहों की जांच होनी चाहिए पर येदियुरप्पा को थैली शाहों तथा पेड न्यूज का शिकार भी नहीं बनने देना चाहिए।
आज का भारत अफ्रीका के किसी ऐसे नवजात और भ्रष्ट समाज का दर्शन कराता है जहां किसी भी क्षेत्र में ईमानदारी बची ही न हो। हाल ही के कुछ ताजा उदाहरण देखें- साठ से सत्तर हजार करोड़ रुपये के घोटाले का दायरा रखने वाला कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, जिसमें प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों से लेकर दिल्ली सरकार तक पर शक की सुई घूम रही है। 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला भारत के अंकेक्षक एवं महा सर्वेक्षक (सीएजी) की रपट के अनुसार एक लाख इकहत्तर हजार करोड़ रुपये के दायरे में है। मुम्बई के आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाले ने तो कारगिल शहीदों की स्मृति तक को अपमानित कर दिया। इन सबकी जांच के लिए जब समूचा विपक्ष संयुक्त संसदीय समिति द्वारा जांच बिठाने की मांग करता है तो सरकार वहां से ध्यान हटाने की कोशिश करती है। वास्तव में किसी भी प्रकार की मांग को लेकर संसद की कार्यवाही बाधित करना संसदीय परम्परा और संसदीय कामकाज के दायित्व का उल्लंघन है लेकिन जब देश राजनेताओं पर भयंकर अविश्वास के अभूतपूर्व दौर से गुजर रहा है तो जांच की उचित प्रक्रिया को लागू करने के लिए सरकार पर दबाव डालने का और कोई तरीका भी शेष नहीं रहता। सरकारी पक्ष तो भ्रष्टाचार के मामले पर विपक्षी नेताओं को बोलने तक का समय नहीं देता।
वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने संसदीय लेखा समिति द्वारा जांच कराए जाने का प्रस्ताव रखा लेकिन विपक्ष ने इसे इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि इस समिति का अधिकार क्षेत्र और दायरा बहुत सीमित है। संसदीय जांच समिति के दायरे में पत्रकारों द्वारा नीरा राडिया से बातचीत का विषय भी आ सकता ताकि पता चले कि बड़े-बड़े संपादक और मीडिया घराने सत्ता के समीकरण किस चतुराई से बिठाते हैं।
हम अपने लोकतंत्र की शान में गौरव गान करते हैं जो उचित ही है। लेकिन यह कैसा लोकतंत्र है जो एक ओर तो 9 से 10 प्रतिशत विकास दर की ऊंचाई छूता है दूसरी ओर 40 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे 20 रुपये प्रतिदिन से कम पर गुजारा करते हैं। एक ओर चुनाव सुधारों तथा राजनीतिक शुचिता पर सेमिनार होते हैं दूसरी ओर जनता का धन लूटकर स्विस बैंकों में सत्तर लाख करोड़ काला धन जमा करने वाले भारतीय नेता और उद्योगपति होते हैं। जो संसद उन लोगों को संरक्षण देने वालों को बचाए जो देश की मिट्टी के साथ विश्वासघात करते हुए संविधान और जनता का मजाक उड़ाते हैं वह संसद निरर्थक और नाकामयाब ही कही जाएगी। इसीलिए विपक्ष एकजुट होकर संसद की मूल भावना बचाने की लड़ाई लड़ रहा है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. अलग संस्था जो राष्ट्रपति को जवाबदेय हो ,फास्टट्रैक अदालत ,
    दोषी पाए जाने पर शख्स के सभी संपत्ति को ज़ब्त करना , पूरा जीवन काल कोठरी में या फांसी (फांसी का अधिकाँश लोग विरोध करेंगे )

    dabirnews.blogspot.com

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  2. रीडर्स डाइजेस्ट का सर्वे कहता है कि पत्रकार आज विश्वास के काबिल नहीं रहे.....

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