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नया धमाका

11/20/2010

हिन्दु नाम के प्राणी की घेरेबंदी जोरो पर: जागो हिन्दु जागो!

आज और कल के समाचार पत्रों में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के दो समाचार प्रकाशित हुए जिनका सीधा सा सम्बंध हिन्दुओं के अस्तित्व से है। इन समाचारों का अगर तार्किक दृष्टि से निष्पक्ष ( सेकुलर नहीं) विश्लेषण किया जाये तो सारा सच हमारे सामने आ जाता है कि पूरी दुनिया और गैर हिन्दु पंथ, सरकारे सभी हिन्दु नाम के प्राणी को केवल इतिहास के पन्नों की वस्तु बना देने के लिए प्रयासरत है।
पहला समाचार:-
विश्व के तथाकथित दारोगा अमेरिका द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता पर एक गलोबल रिपोर्ट जारी की गई है जिसमें मुस्लिम तुष्टिकरण की राह पर चलने वाली भारत की मनमोहन सिंह सरकार को तो अल्पसंख्यकों ( जिनकी संख्या कुल भारतीय आबादी का 30 प्रति. है) के अधिकारों, जान-माल और परम्पराओं की रक्षक होने का अन्तर्राष्ट्रीय सेकुलर प्रमाण पत्र जारी किया गया है, दूसरी ओर भारत के सर्वाधिक प्रगतिशील और हर दृष्टि से शांत राज्य गुजरात की सरकार और मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को साम्प्रदायिक होने, हिन्दु विरोधियों की जान-माल के दुश्मन के रूप में दिखाया गया है। इसके साथ ही जहां भी गैर कांग्रेसी या भारतीय जनता पार्टी की सरकारे है उनको भी इसी श्रेणी में रखा गया है। आखिर इस रिपोर्ट के क्या मायने है
सन 2001 में भारत में इसाई पंथ के सबसे बड़े धर्मगुरू पोप का भारत आगमन हुआ था, भारत में अपने कार्यक्रम के दौरान पोप ने फरमाया कि इसाई धर्म विश्व का सबसे प्रगतिशील, वैज्ञानिक व बड़ा धर्म है। ईसा की प्रथम सहस्त्राब्दि में हमारे पूर्वजों ने अमेरिका क्षेत्र को, दूसरी सहस्त्राब्दि में पूरे यूरोप को ईसाई बनाया है और अब हमारी खुली घोषणा है कि इस तीसरी सहस्त्राब्दि में हम भारत और शेष एशिया को प्रभु ईसा मसीह के चरणों में डाल देगें। पोप पूरे विश्वभर के ईसाई देशों की सरकारों पर अपना प्रभाव रखते है और पोप की आज्ञा का पालन करना सभी ईसाई देश मसीही कार्य मानते है इस कारण प्रतिवर्ष लाखो डालर चंदा वेटिकन को धर्म प्रसार के नाम पर मिलता है यह एक अलग बात है कि उस चन्दे का एक बड़ा हिस्सा इसाई पादरियों के द्वारा किए गए यौनाचार का मुआवजा देने में खर्च हो जाता है। खैर, इस पर चर्चा आगामी लेखों में करेगंे!
विभिन्न सरकारों द्वारा ईसाई धर्म प्रचार-प्रसार के नाम पर आने वाला चंदा वेटिकन के माध्यम से पूरी दुनिया में संचालित विभिन्न चर्चो में भेजा जाता है, चर्च अपनी सुविधा और योजना अनुसार इस धनराशि को खर्च करते है लेकिन लक्ष्य सभी का एक रहता है - धर्मान्तरण। पूरे विश्वभर में इस समय लगभग 10 हजार नामों से ईसाई मिशन कार्यरत है जो राहत कार्य, शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा आदि के नाम पर भोले-भाले नागरिकों को बरगला कर उन्हे अपने पंथ में दीक्षित करते है यानि कि अन्य धर्मो से ईसाई बनाते है। अगर दुनिया की कोई भी सरकार इस काम में अड़चन पैदा करती है तो ईसाई संगठन अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में अशांति पैदा कर अलगाव और आतंक की आग भड़का सकते है जैसे कि भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों में हो रहा है। दूसरे नम्बर पर विभिन्न समुदायों और जातियों के मध्य संघर्ष पैदा कर सकते है, तीसरे अलग-अलग प्रकार के सर्वव्यापी दुर्लभ नस्ल के प्राणियों जिन्हे धर्मनिरेपक्ष या सेकुलर तत्व कहा जाता है, को साथ लेकर अल्पसंख्यकों पर भारी अत्याचार हो रहा है, इनके मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, का शोर करते है। अगर मिशनरी के ये सारे हथियार फुस्स हो जाये, इनका कोई बस न चले तो .......। तो भी ये लोग हिम्मत नहीं हारते इनका सबसे बड़ा हथियार अभी तक इनके तरकश में जो है। कौनसा...। इस स्थिति में अमेरिका जैसा विश्व का ठेकेदार धार्मिक स्वतंत्रता की ग्लोबल रिपोर्ट जारी करता है कि उस अमुक देश में अल्पसंख्यकों की जान को खतरा है, उनको मानवीय और धार्मिक अधिकारों से महरूम किया जा रहा है। विश्वभर की अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता में आज ईसाई देश बेजोड़ है ऐसे में जिस देश का नाम इस रिपोर्ट में आता है उस देश की सरकार चुप्पी साध लेती है और धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर धर्मान्तरण का काम जोर-शोर से प्रारंभ हो जाता है। आज भारत की भयावह स्थिति है कि देश में लगभग 5 करोड़ अघोषित ईसाई है, अगर इस संख्या को सरकारी आंकड़ों के साथ जोड़ दिया जाये तो यह संख्या कुल भारत की आबादी का 10 प्रति. से अधिक भी हो सकती है। यानि भारत में मानवाधिकारों के नाम पर, धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर हिन्दु नाम की नस्ल तेजी से ईसाई बनती जा रही है और वो दिन दूर नहीं की जब इतिहास के पाठ में पढ़ाया जायेगा कि भारत में एक समय में हिन्दु नाम का धर्म हुआ करता था जो हिन्दुओं की कुम्भकर्णी नींद के कारण स्मृतिशेष हो गया।
दूसरा समाचार:-ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खुमैनी ने विश्वभर के मुसलमानों का आह्वान किया है कि वो भारत के जम्मू-कश्मीर में चल रहे जेहाद का समर्थन करे। यह पूरे विश्वभर में व्याप्त इस्लाम की विस्तारवादी नीति की एक उदाहरण है, आज सारी मानवता के लिए एक अभूतपूर्व खतरा बन गया है, ईरान के नेता तो भारत के अभिन्न अंग जम्मू-कश्मीर के बारे में क्या पता जानते है या नहीं किंतु भारत के हिन्दुओं को इस बात का ज्ञान होगा आवश्यक है कि कश्मीर समस्या की पृष्ठभुमि क्या है
भारत संविधान के अनुसार एक पंथ निरेपक्ष प्रजातंत्र है। जिसका अर्थ है सरकार सभी मतो- सम्प्रदायों को समान मानेगी किसी भी मत-सम्प्रदाय को विशेष महत्व नहीं देगी। यह भारतीय संविधान का सैद्धांतिक पक्ष है किंतु व्यवहार में 1947 से लेकर आज तक इस पंथ निरपेक्षता को लेकर मुस्लिम तुष्टिकरण का खेल खेला जा रहा है। हिन्दुओं ने अपनी सहिष्णुता के कारण मुस्लिम और इसाई तुष्टिकरण की इस राजनीति का कोई खास विरोध नहीं किया अतः हिन्दु समाज की उपेक्षा लगातार जारी है। इसी तुष्टिकरण के दुष्परिणाम के रूप में आज कश्मीर समस्या अपना भयानक रूप लेकर हमारे सामने खड़ी है जिसके समाधान का रास्ता देश के सत्ताधीशों को नहीं सूझ रहा है। कश्मीर का दर्द आज से 600 साल पूर्व प्रारंभ हुआ था, जब सुल्तान सिकंदर ने कश्मीर पर आक्रमण करके कत्ले-आम मचाया था। उसने वहां रहने वाले लोगो को आदेश दिया था- अगर कश्मीर में रहना है तो मुसलमान होकर रहना पड़ेगा, नहीं तो मरना होगा या कश्मीर छोड़कर भागना होगा यानि सीधे शब्दों में कहे तो तीन में से एक चीज को चुनो - इस्लाम, मौत या पलायन। वही परम्परा कश्मीर में आज भी चल रही है। जो लोग अपना धर्म छोड़कर मुसलमान बन गए उन्होने हिन्दुओं पर भीषण अत्याचार प्रारंभ कर दिए। आर्य समाज की प्रेरणा से कश्मीर के मुसलमानों को हिन्दु धर्म में लाने का प्रयास भी हुआ, कश्मीर के तात्कालीन नरेश रणजीत सिंह भी इससे सहमत थे किंतु पण्डितों द्वारा मुसलमानों का परावर्तन करने से इंकार करने के कारण यह कोशिश फलीभूत नहीं हो सकी। देश के बंटवारे के घाव कश्मीर की जनता को भी सहने पड़े। विभाजन के समय कश्मीर में महाराजा हरिसिंह सत्ता पर काबिज थे, आरएसएस के द्वितीय सरसंघचालक परम पूज्य माधव सदाशिव राव गोळवलकर उपाख्य श्रीगुरूजी द्वारा जम्मू-कश्मीर के महाराजा से की गई मंत्रणा के फलस्वरूप महाराजा ने अपनी रियासत का भारत में विलय कराने पर सिद्धांततः सहमति दी। जिस समय महाराजा द्वारा विलय पर सहमति प्रदान की गई उसी समय पाकिस्तानी कबायलियों द्वारा जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण किया गया ताकि सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस रियासत को पाकिस्तान में मिलाया जा सके, इस आक्रमण को तात्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा कतई गंभीरता से नहीं लिया गया। पंडित नेहरू ने अपनी अंग्रेजप्रियता और मुस्लिमपरस्ती से कश्मीर के राजा के बिना शर्त विलय प्रस्ताव को स्वीकृत करने में अनावश्यक विलम्ब किया जिस कारण जम्मू-कश्मीर का लगभग 78,000 वर्ग किमी क्षेत्र पाकिस्तानी कबायलियों के कब्जे में चला गया। यह तो तात्कालीन आरएसएस प्रमुख श्रीगंरूजी के व्यक्तित्व व संगठन कौशल्य का ही प्रभाव था कि जब तक तात्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री सरदार पटेल द्वारा जम्मू-कश्मीर में सेना भेजी गई तब तक संघ के स्वयंसेवकों द्वारा शत्रु सेना से लोहा लेने के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर की हवाई पट्टियों को भी तक अपने कब्जे में रखा गया। संघ के कार्यकर्ताओं के आत्मोत्सर्ग व भारतीय सेना के शौर्य के कारण कश्मीर का वर्तमान भू-भाग तो हमारे पास रह गया किंतु जो भू-भाग पाकिस्तान के कब्जे में चला गया उसे सैन्यबल से प्राप्त करने की बजाए देश के प्रधानमंत्री नेहरू उसे संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए जिस कारण भारत की भूमि ही पूरी दुनिया की नजर में विवादित प्रकरण बनकर रह गई।
26 अक्टूबर 1947 को कश्मीर के भारत में विलय के साथ ही वहां के अलगाववादी तत्वों ने आजादी और पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाने शुरू कर दिए थे। जिस कारण तात्कालीन केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री के दबाब में आकर राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देते हुए राज्य में धारा 370 लागू कर दी जिसका अभिप्राय है कि भारतीय संविधान की धारा 1 व 370 को छोड़कर अन्य कोई धारा कोई भी कानून राज्य में लागू नहीं होगा, राज्य के पृथक संविधान को मान्यता की मूक स्वीकूति मिली, धारा 370 के कारण जम्मू-कश्मीर के नागरिक भारत के नागरिक है किंतु भारत के अन्य राज्यों के नागरिक जम्मू-कश्मीर के नागरिक नहीं हो सकते, अन्य राज्यों की भांति भारतीय नागरिकों को राज्य में स्थायी निवास करने, जायदाद खरीदने से भी यह धारा वंचित करती है। अगर किसी भी भारतीय नागरिक को राज्य का प्रथम नागरिक अर्थात राज्यपाल भी मनोनीत कर दिया जाये तो भी वह राज्य में मतदान तक करने का अधिकारी नहीं है। इस धारा के कारण राज्य को देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा विशेष दर्जा दिया गया जिसकी आड़ में मुस्लिम बहुल यह राज्य इस धारा का दुरूपयोग करते हुए केन्द्र सरकार पर दबाब बनाने के साथ-साथ अब तक देश का सवा दो लाख करोड़ रूपया ले चुका है। इसमें भी एक दूसरा पहलू है कि केन्द्र से प्राप्त पूरा धन मात्र घाटी में ही लगाया जा रहा है किंतु फिर भी कोई सार्थक परिणाम आज तक सामने नहीं आया है। 1989-90 में मुस्लिम अलगाववादियों से परेशान होकर 3 लाख से अधिक कश्मीरी पण्डित घाटी छोड़कर भारत की सड़कों पर शरणार्थी के रूप में जीवन बसर कर रहे है। इनके पुनर्वास के लिए भारत सरकार के पास कोई योजना नहीं है।
आज स्थिति इतनी भयावह है कि जम्मू-कश्मीर मात्र सेना के बल पर ही भारत का है। वोटो की राजनीति के चलते और मुस्लिम अलगावादियों के दबाब में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर साहब केन्द्र सरकार से घाटी के अशांत क्षेत्र में सेना के विशेषाधिकार कम करने की बात कह रहे है। पिछले कुछ समय में वहां से 30 हजार सैनिक हटा लिए गए है, जिससे पाकपरस्त तत्वों का हौंसला बढ़ा ही है। वर्तमान में केन्द्र सरकार उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में सेना को विशेषाधिकार देने वाले आर्म्ड फोर्सेज स्पैशल पावर एक्ट में संशोधन का विफल प्रयास कर चुकी है। अब गेंद केन्द्र सरकार के पाले में है किंतु जिस प्रकार से केन्द्र सरकार व कांग्रेस  पदाधिकारियों के बयान आ रहे है अगर ऐसी हालात में एक विदेशी मुसलमान ने बयान दे दिया तो क्या फर्क ..............।
दोनो समाचारों का छुपा पक्ष आपके समक्ष पेश है अब निर्णय हिन्दु समाज को करना है कि वो धर्मनिरेपक्षता के आत्मघाती पथ को अपना कर अपनी आने वाली पीढ़ी को ईसाई या मुसलमान दोनो में से क्या बनाना चाहता है। अगर हिन्दु समाज का थोड़ा सा भी स्वाभिमान जिंदा है तो उसे भी सड़कों पर उतर कर इसका विरोध करना चाहिए आखिर मुसलमान भी तो डेनमार्क में बने हजरत पैगम्बर के कार्टून को लेकर भारत की सड़कों पर उतरते है ना।

1 टिप्पणी:

  1. कश्मीर के हालात बहुत बिगड़ दिये हैं मुस्लिम परस्ती नेऔर सोये हुये हिन्दुओं ने...

    वे आज सोचते हैं कि कश्मीर में भड़की आग उन तक नहीं ्पहुंचेगी तो यह निरा भरम है...

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