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नया धमाका

12/07/2010

सेकुलर शिकंजे में जकड़े राष्ट्रीय स्मारक

प्रत्येक देश के स्मारक उसकी संस्कृति, गौरव, परम्परा, संघर्ष तथा जीवन मूल्यों के प्रतिबिम्ब होते हैं। ये स्मारक देश की विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति के परिचायक होते हैं। ये स्मारक देशवासियों को प्रेरणा तथा ऊर्जा प्रदान करते हैं। भारत के ऐसे अनेक गौरव चिन्ह इसके विशाल मन्दिरों, भवनों, दुर्गों, मण्डपों, मूर्तियों, गुफा एवं शैल चित्रों में अभिव्यक्त होते हैं। समय-समय पर विदेशी आक्रांताओं द्वारा खण्डित किए गए अनेक मंदिर भी इसकी गौरव गाथा कहते हैं। इन स्मारकों की सुरक्षा-व्यवस्था, जीर्णोंद्वार प्रत्येक सरकार का दायित्व है।
पाश्चात्य देशों ने अपने स्मारकों की सुरक्षा तथा रख-रखाव की ओर विशेष ध्यान दिया है। मुख्यत: 19वीं शताब्दी के मध्य से इस सन्दर्भ में सभी देशों में सजगता बढ़ी। ब्रिाटेन जैसे देश ने जहां अपने महाकवि शेक्सपीयर, मिल्टन के घरों को भी राष्ट्रीय स्मारक का रूप दिया, वहीं अमरीका ने पर्वतों को काटकर अपने महापुरुषों अब्राहम लिंकन, जार्ज वाशिंगटन तथा जैफरसन को उनको आकार दिया है। अमरीका में ऐसे हजारों स्थानों को राष्ट्रीय स्मारकों की श्रेणी में रखा है।
ऐतिहासिक स्मारकों की उपेक्षा यह हमारा गौरव है कि सतत् आक्रमणों एवं ध्वंसों के बाद भी भारत में 8000 स्थान राष्ट्रीय स्मारक माने गए हैं। भारत सरकार के अन्र्तगत भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के इनमें से 3665 स्थानों की देखभाल करता है। इनमें से भी 35 स्थानों का उसे पता ही नहीं है तथा 249 स्थानों पर सरकारी उपेक्षा तथा उदासीनता के कारण अन्य लोगों ने कब्जा कर लिया है।
1972 की "वल्र्ड मोन्यूमेन्ट कन्वेंशन" के बाद यूनेस्को के अन्र्तगत 107 देशों के 507 स्थानों को "विश्व सांस्कृतिक विरासत के रूप में चिन्हित किया है। भारत के भी ऐसे 27 स्थान चुने गए। इनमें से केवल दो-चार स्थानों को छोड़कर उचित व्यवस्था तथा सुरक्षा का अभाव है। स्वाभाविक रूप से इनमें से अधिकतर स्थान भारतीय संस्कृति तथा पहचान से जुड़े हैं। इनमें प्रमुख है कोणार्क का सूर्य मंन्दिर, खजुराहो का मन्दिर समूह, महाबलिपुरम के मन्दिर, तंजाबूर का बृहदेश्वर मन्दिर, हम्पी (विजयनगर), अजन्ता, एलोरा तथा एलीफेन्टा की गुफाएं। परन्तु यहां भी दुव्र्यवस्था है। उदाहरण के लिए, कोणार्क के सूर्य मन्दिर की कुछ देखभाल सूर्यग्रहण पर ही होती है। अन्यथा इस पर लगभग एक दर्जन समितियां बन चुकी हैं पर अभी तक परिणाम शून्य ही है। भारत में ब्रिाटिश साƒााज्य के चिन्ह स्वरूप विश्व सांस्कृतिक धरोहर में मुम्बई का गेट वे आफ इंडिया, जो भारत में जार्ज पंचम तथा महारानी के स्वागत में बनाया गया था, तथा दिल्ली का इंडिया गेट, जो 80,000 भारतीय सैनिकों के प्रथम विश्वयुद्ध में बलिदान स्वरूप बनाया गया, की सुरक्षा तथा व्यवस्था ही उचित तथा व्यवस्थित है।
मुगलकालीन स्मारकों को ही महत्व यह एक गंभीर चिंतन का विषय है कि विश्व सांस्कृतिक धरोहर तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने सर्वाधिक महत्व मुगलकालीन स्मारकों को ही दिया तथा इन पर भारत असन्तुलित धन व्यय कर रहा है। उदाहरण के लिए आगरा के ताजमहल के संरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपए व्यय हो रहे हैं। हुमायूं के मकबरे और कुतुब मीनार की भव्यता को बनाये रखने के लिए मेट्रो परियोजना में परिर्वतन किया गया। दिल्ली के लाल किले की मरम्मत पर प्रतिवर्ष काफी खर्च होता है। दिल्ली की जामा मस्जिद की मरम्मत के लिए सऊदी अरब का शाह भी अरबों रुपया लगाने को उत्सुक है। कुतुब मीनार के साथ लगी मस्जिद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के सभी सुरक्षा नियमों को ताक पर रखकर नमाज पढ़ी जाती है। दक्षिण दिल्ली में भी ऐसी कई मस्जिदें हैं। पर बेबस है भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग और बेबस है भारत का सांस्कृतिक मंत्रालय भी।
इस सन्दर्भ में यूनेस्को के सांस्कृतिक कार्यक्रम की विशेषज्ञ मोबी चीबा का कथन अत्यंत गंभीर तथा भारतीय जनमानस को झकझोरने वाला है। वह रहस्योद्घाटन करते हुए कहती हैं कि भारत में एक से एक सांस्कृतिक धरोहर हैं पर केवल मुगलकालीन स्मारकों को ही विश्व धरोहर बनाने पर अत्यधिक आग्रह किया जाता है।
भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् राष्ट्रीय स्मारक के जीर्णोद्धार का केवल एक ही उल्लेखनीय कार्य हुआ, और वह था सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण। इसका जीर्णोद्धार किया भारत के राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद व गृहमंत्री सरदार पटेल ने। यह भी सही है कि प्रधानमंत्री पं. नेहरू अपनी भ्रमित बुद्धि तथा छद्म सेकुलरवाद के कारण ऐसा होने देना नहीं चाहते थे। एक दूसरा प्रयास रा.स्व.संघ की प्रेरणा से भारतीय जनता की ओर से हुआ-कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानन्द के शिला स्मारक का।
इन महापुरुषों के स्मारक क्यों नहीं? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीयों को स्वतंत्रता 1300 वर्षों के कठोर तथा सतत् संघर्ष के पश्चात मिली है। इसके लिए हजारों वीरों, संतों, भक्तों, सैनिकों, कवियों, कलाकारों ने अपने-अपने ढंग से प्रयास किए। अत: स्वतंत्रता के पश्चात उन महापुरुषों के नए राष्ट्रीय स्मारक बनने चाहिए। क्या पृथ्वीराज चौहान, हेमचन्द्र विक्रमादित्य, राणा सांगा, महाराणा प्रताप, शिवाजी, गुरु गोविन्द सिंह के बलिदान को भुलाया जा सकता है? क्या महाकवि सूरदास, तुलसीदास, रैदास, गुरुनानक का योगदान कम है? नाना साहेब, तात्या टोपे, कुंवर सिंह, महारानी लक्ष्मीबाई के प्रयास किसी भी वर्तमान राजनीतिज्ञ से कम थे? देश का दुर्भाग्य है कि हमने स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द आदि को भुला दिया है। क्षुद्र राजनीति के कारण बंगाल में स्वामी विवेकानंद के जन्मस्थान को अनेक लोग जानते भी नहीं। राज राममोहन राय के घर पर आज भी एक छोटी-सी पट्टी लगी है। बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय को कोई स्थान नहीं दिया जाता। यहां तक कि नेताजी सुभाष भी उपेक्षा के पात्र बने रहे। नवनिर्मित राष्ट्रीय स्मारकों में इनको उच्च स्थान तथा प्राथमिकता क्यों नहीं दी जानी चाहिए?
वासुदेव बलवन्त फड़के से लेकर सुभाष चन्द्र बोस तक देश पर बलिदान होने वालों की एक लम्बी श्रृंखला रही है, परन्तु भारत में उनके नाम पर कोई स्मारक, स्टेडियम, पार्क, विश्वविद्यालय, पु#ुस्तकालय आदि कुछ भी नहीं बनाया। वस्तुत: यह कृतघ्नता ही है कि शहीद भगत सिंह के अन्य दो साथियों के बारे में देश का युवा कुछ भी नहीं जानता। पंजाब में सुखदेव का कोई स्मारक नहीं, इसी भांति राजगुरु का वह स्थान जहां उन्होंने जन्म लिया था, आज खण्डित अवस्था में है। इलाहाबाद के कम्पनी बाग में, जो आज मोतीलाल पार्क कहलाता है, मुश्किल से एक कोने में वह भी छात्रों के संघर्ष के बाद, चन्द्रशेखरआजाद को स्थान मिल पाया।
सिर्फ राजनेताओं के स्मारक? यह भी आश्चर्यजनक है कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र घोषित करने वाले भारत में नवनिर्मित स्मारकों में राजनीतिकों को ही प्रमुख रूप से स्थान दिया गया है। विश्वविद्यालय, स्टेडियम, बाजार, पार्क, चौराहा, एयरपोर्ट, गली, मोहल्ला सभी के नाम प्राय: सत्ताधारी पार्टी या उनके प्रमुखों के नाम पर हैं। इनमें से ही अधिकांश नेहरू-गांधी खानदान के नाम पर। यह ज्ञात नहीं कि ये सामन्तशाही के चिह्न कब तक बने रहेंगे?
प्रश्न यह है कि प्राचीन सांस्कृतिक विरासत तथा नवीन राष्ट्रीय स्मारकों के प्रति क्या नीति हो? आवश्यकता है कि नेशनल मोन्यूमेंट अथारिटी शीघ्रातिशीघ्र बने, जिसके सदस्य विशेषज्ञ हों। इसे राजनीति से दूर रखा जाए। जीवित व्यक्तियों की मूर्तियों या स्मारकों पर पूर्णत: प्रतिबंध हो। यह भारतीय परम्परा के भी अनुकूल नहीं है। उनके समाधि स्थल, मकबरे तथा स्मारक आने वाली पीढ़ियों पर छोड़ दिए जाएं।

1 टिप्पणी:

  1. ये देखिये अरब समाज का असली चेहरा
    ये है कट्टरता की पोल
    http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2010/12/101208_saudia_parties_wikileaks.shtml

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