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नया धमाका

11/24/2010

ब्रिटिश सरकार ने भारत की सत्ता कांग्रेस को क्यों सौंपी?

यह भारतीय इतिहास का एक विवादित प्रश्न, एक अनबूझ पहेली तथा विचारणीय विषय है- कि अंग्रेजों ने 15 अगस्त, 1947 को भारतीय राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण कांग्रेस को ही क्यों किया? यह सर्वविदित कि 1946 के चुनाव में केवल 11 प्रतिशत लोगों को ही मतदान का अधिकार था तथा उससे चुनकर आए सदस्य अपने-अपने क्षेत्रों से कुल मतों की तुलना में बहुत कम मतों से जीते थे। उस समय वयस्क मताधिकार न था, जबकि पाकिस्तान का निर्माण मुस्लिम जनमत संग्रह से हुआ था जिसमें 96.5 प्रतिशत मुसलमानों ने पाकिस्तान के निर्माण को सहमति दी थी तथा वहां मुस्लिम लीग की सरकार स्थापित हुई थी। इसके विपरीत भारत के कुछ दलों द्वारा बहुसंख्यक समुदाय के जनमत संग्रह की मांग बार-बार की गई, परन्तु ब्रिटिश सरकार ने इसे स्वीकार नहीं किया। प्रश्न यह भी है कि क्या ब्रिटिश सरकार के पास हिन्दुस्थान के लिए कोई विकल्प न था या अंग्रेज सरकार किसी अन्य विकल्प को चाहती ही नहीं थी? क्या वह पूर्ण हस्तांतरण चाहती थी या सीमित सीमा तक सत्ता सौंपना चाहती थी।
यदि हम द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात भारत के राजनीतिक परिदृश्य का विचार करें तो स्थिति स्पष्ट हो सकती है। ब्रिटिश सरकार की नीति तथा कांग्रेस के विभिन्न कार्यक्रमों में भारत का बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय सर्वथा उपेक्षित रहा। कांग्रेस ने हिन्दू समाज को विविध मतों तथा सम्प्रदायों के रूप में देखा। उसने हिन्दुओं की सम्पूर्णता, एकत्व तथा समग्रता का कभी विचार नहीं किया।
हिन्दुओं की अनदेखी
ब्रिटिश सरकार ने भी प्रारंभ से ही भारतीय समाज को मुख्यतरू मुस्लिम तथा गैरमुस्लिम के रूप में देखा। ब्रिटिश चुनाव प्रक्रिया में चुनाव क्षेत्रों अथवा मतदाताओं को मुस्लिम, सिख तथा सामान्य की श्रेणी में बांटा। कहीं भी हिन्दू के रूप में उसके प्रतिनिधित्व के लिए विशिष्ट शब्दावली का प्रयोग नहीं किया। अत: व्यावहारिक रूप से राजनीति में हिन्दू के स्वरूप को पूर्णतरू अप्रासंगिक करने में जहां कांग्रेस ने सहयोग दिया वहीं ब्रिटिश सरकार ने जान बूझकर कूटनीति ढंग से अलग किया। अर्थात 85 प्रतिशत हिन्दुओं का अपना प्रतिनिधित्व कहीं न था। न ही उनका कोई संगठित प्रयास था। हिन्दुओं के नाम पर केवल हिन्दू महासभा थी, जिसके प्रयास तथा क्षेत्र एक हद तक सीमित थे। हिन्दू महासभा का जन्म 1915 में हुआ था। पं. मदनमोहन मालवीय, लाल लाजपतराय, वीर सावरकर, डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इसे सुदृढ़ वैचारिक आधार प्रदान किया। उनके चिंतन में संस्कृति, हिन्दुत्व व भारतीयता की भावना थी। 1933 में इसके अध्यक्ष भाई परमानन्द ने ब्रिटिश सरकार का विरोध करते हुए हिन्दुओं को भारत का मुख्य समुदाय मानने को कहा था। डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1946 में अर्थात स्वतंत्रता से पूर्व साम्प्रदायिकता के आधार पर राज्यों का गठन, हिन्दुओं तथा मुसलमानों में बराबरी तथा पाकिस्तान निर्माण का विरोध किया था। उन्होंने लार्ड बेवल की योजना को भी अस्वीकार किया। प्रसिद्ध विद्वान प्रोफेसर कूपलैण्ड ने लिखा कि इसी कारण बेवल ने शिमला कांफ्रेंस में हिन्दू महासभा को नहीं बुलाया था। हिन्दू महासभा के बिलासपुर अधिवेशन में वीर सावरकर ने अखण्ड भारत के साथ एक व्यक्ति एक वोट तथा समान नागरिकता की बात कही थी। 16 जून, 1946 को हिन्दू महासभा ने अपने प्रस्ताव में एक मजबूत केन्द्रीय शासन तथा जनसंख्या के आधार पर अन्तरिम सरकार की स्थापना की बात कही थी।
यह उल्लेखनीय है कि जब माउन्टबेटन मई, 1947 में एक-एक करके भारतीय नेताओं से बातचीत कर भारत के विभाजन का वातावरण बना रहे थे तब हिन्दू महासभा के महासचिव वी.जी. देशपांडे ने 21 मई, 1947 को विभाजन की योजना को विनाशकारी बतलाया था तथा कांग्रेस के नेताओं से अनुरोध किया था कि वे भारत का भविष्य बिना भारत के बहुसंख्यक समाज का जनमत संग्रह कराए, स्वीकार न करें। हिन्दू महासभा के अध्यक्ष एल.बी. भोपटकर ने 3 जून, 1947 के प्रस्ताव, जिसे कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने स्वीकृति दी थी, को राष्ट्र के साथ विश्वासघात कहा था। उन्होंने समूचे देश में 3 जून को काला दिवस मनाने का आह्वान किया था। डा. गोकुल चन्द नारंग ने इस बात की कटु आलोचना की थी कि जो कांग्रेस 1946 के चुनावों में भारत की एकता की बढ़-चढक़र बातें करती थी, अब वह कहां है? दयाल सिंह बेदी ने कहा कि यह विचित्र संयोग है कि मोतीलाल नेहरू ने बम्बई को सिन्ध से अलग किया, अब उनका पुत्र सिन्ध को शेष भारत से अलग कर रहा है। इसी भांति 15 अगस्त को शोक दिवस मनाने को कहा। वीर सावरकर ने पुन: आलोचना करते हुए कहा था कि कांग्रेस कहती है कि हमने विभाजन स्वीकार कर देश को रक्तपात से बचाया, सही यह है कि जब तक पाकिस्तान रहेगा, पुन: रक्तपात का खतरा बना रहेगा। संक्षेप में हिन्दू महासभा स्वतंत्रता से पूर्व अखण्ड भारत, पाकिस्तान निर्माण का विरोध तथा विभाजन से पूर्व हिन्दुओं के जनमत संग्रह की मांग कर रही थी।
हिन्दू महासभा की भांति भारत के समाजवादी नेता 1946 में किसी भी प्रकार के विभाजन को अस्वीकार कर रहे थे। इनमें प्रमुख रूप से जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, डा. राम मनोहर लोहिया तथा अरुणा आसफ अली थे। उन्होंने राष्ट्रवाद का आधार किसी भी प्रकार के तत्वों से, जो विदेशी प्रभुत्व के बीच आते होंप्ते, से पूर्ण मुक्ति, भारत की राजनीतिक तथा आर्थिक एकता, सभी नागरिकों के लिए एक समान संहिता को आवश्यक बताया था। उन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता का अर्थ प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश प्रभुत्व की समाप्ति पर बल दिया, जिसमें भारतीय संविधान के निर्माण से पूर्व ब्रिटिश सेना की वापसी, ब्रिटिश पूंजीवादी हितों की समाप्ति को भी आवश्यक बताया था। साथ ही राष्ट्रीय एकता तथा प्रजातंत्र के लिए किसी भी प्रकार के समझौते को अस्वीकार किया था। उल्लेखनीय है कि समाजवादी दल ने कैबिनेट मिशन योजना के अन्तर्गत चुने गये सदस्यों को अस्वीकार करके संविधान सभा के लिए सीधे चुनाव की मांग की थी, इसके लिए उन्होंने वयस्क मताधिकार के आधार की भी मांग की थी। 3 जून, 1947 के भारत विभाजन के प्रस्ताव को अस्वीकृत किया था।
कम्युनिस्टों की मानसिकता
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की भारत विभाजन के सन्दर्भ में कोई सक्रिय भूमिका का प्रश्न ही नहीं था। यद्यपि 1942 के आन्दोलन में कम्युनिस्टों ने अंग्रेजों का पूरी तरह साथ दिया था परन्तु न उसके पीछे भारतीय जन समर्थन था और न ही अंग्रेजों का विश्वास। उन्होंने भारत को दो नहीं बल्कि 17 पृथक पूर्ण राज्यों में बांटने की योजना रखी, जो मानी जाती तो महाविनाशकारी होती।
सिख समुदाय ने भी 9 व 10 जून, 1946 को भारत के भविष्य का गहन चिन्तन किया था जिसमें सिख विचार के अनेक प्रमुख व्यक्ति सम्मिलित हुए थे। मास्टर तारा सिंह ने इसमें आह्वान किया था कि या तो ब्रिटिश राज्य को समाप्त करो अन्यथा स्वयं खत्म हो जाओ। उन्होंने सिख एकता पर बल दिया था। उन्होंने भी कैबिनेट मिशन योजना की कटु आलोचना की थी तथा 3 जून 1947 के विभाजन की आलोचना की थी। प्रसिद्ध क्रांतिकारी सरदार अजीत सिंह ने विभाजन की स्वीकृति को महान भूल कहा। बाबा खडग़ सिंह ने भी इसका तीव्र विरोध किया था। महाराजा फरीदकोट ने इसे अपवित्र बतलाया।
कुल मिलाकर भारत के राजनीतिक परिवेश में ब्रिटिश सरकार द्वारा कांग्रेस को सत्ता हस्तांतरण करने के चार प्रमुख कारण थे। प्रथम, कांग्रेस के अलावा भारत के सभी प्रमुख दल भारत विभाजन का प्रत्यक्ष रूप से विरोध कर रहे थे तथा उन्हें विभाजन अस्वीकार था। दूसरे, कांग्रेस सही अर्थों में ष्ब्रिाटिश कामनवैल्थष् के अधीन, डोमिनियन स्टेटस से ही सन्तुष्ट थी, जबकि शेष दल अंग्रेजों के प्रभाव से पूर्णतरू मुक्त शासन चाहते थे। तीसरे, कांग्रेस को छोडक़र सभी दल भारतीय संविधान सभा के निर्माण के लिए देशव्यापी चुनाव के पक्ष में थे। हिन्दू महासभा हिन्दुओं का जनमत संग्रह कराना चाहती थी तथा समाजवादी दल वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्णय। चौथे, भारत में हिन्दू शक्ति का प्रभाव बढ़ रहा था, जो न कांग्रेस के लिए हितकारी था और न ब्रिटिश सरकार के। अत: ब्रिटिश सरकार ने अपने वर्तमान तथा भविष्य का ध्यान रखते हुए भारत शासन की सत्ता कांग्रेस को ही सौंपी।

1 टिप्पणी:

  1. यह तो हमेशा होती आई है कि हिन्दुओं का प्रभाव नहीं बड़ना चाहिए, हिन्दु कभी संगठित नहीं होने चाहिए और उनके हाथों में भारत की सत्ता नहीं आनी चाहिए। शायद अंग्रेजों से प्रेरणा लेकर कांग्रेस आज तक उसी राह पर चल रही है।

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