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नया धमाका

11/21/2010

भारत माता के पुनः विखण्डन का खतरा

देश की आजादी के 63 साल बीत जाने के बाद भी भारत के समक्ष राष्ट्र-विखंडन के खतरे विद्यमान हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश की सीमाओं की सुरक्षा और भारत की भौगोलिक अखंडता का प्रश्न सदैव वोट की राजनीति, सेकुलर सोच व समझौतापरस्त विदेश नीति के प्रपंच में ही उलझा रहा। पाकिस्तान तो अपने जन्मकाल से ही भारत को खंड-खंड करने का जिहादी सपना पाले हुए है और इसे साकार करने के लिए उसने कितने ही प्रयत्न किए। जब हम आजादी का जश्न मना ही रहे थे कि उसने भारत के भाल कश्मीर पर आघात किया और सब जानते हैं कि जब देश के वीर जवानों ने अपने पराक्रम से दुश्मनों को देश की सीमाओं से खदेड़ बाहर किया, तब प्रधानमंत्री नेहरू ने "दरियादिली" दिखाते हुए मामला संयुक्त राष्ट्र के सुपुर्द कर दिया और मानो पाकिस्तान हारी हुई बाजी जीत गया। परिणामत: कश्मीर का 78000 वर्ग कि.मी. हिस्सा आज भारत के नक्शे में नहीं दिखाई देता है। अब तो पाकिस्तान प्रेरित जिहादी आतंकवाद भारत की आंतरिक सुरक्षा व एकता-अखण्डता के लिए स्थाई खतरा बन गया दिखता है। पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई नेपाल व बंगलादेश में भी अनेक प्रकार के भारत विरोधी षड्यंत्र रचकर उन्हें उकसाती रहती है। हमारे नौसेनाध्यक्ष की यह चेतावनी गंभीर है कि "भले ही भारत पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर दे दे, लेकिन उसकी सोच में कोई बदलाव नहीं आएगा और वह भारत को तोड़ने की कोशिशें करता रहेगा।" लेकिन देश के वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उससे बेफिक्र शर्म-अल-शेख में उसी पाकिस्तान के साथ शर्मनाक समझौता कर आए।
उधर, कृतघ्न बंगलादेश जिसे भारत ने अपने खून से सींचा, अपने 3 करोड़ से ज्यादा मुस्लिम घुसपैठियों व हूजी जैसे खतरनाक इस्लामी आतंकवादी गुट के भरोसे भारत के पूर्वोत्तर में उथल-पुथल मचाए हुए है, वहां सक्रिय उल्फा जैसे अलगाववादी विद्रोही गुटों को अपने यहां प्रश्रय दे रहा है, उन्हें हर प्रकार की मदद देता है, अपने यहां उनके प्रशिक्षण शिविर चलाता है, उल्फा का मुखिया वहां रहकर अपनी भारत विरोधी गतिविधियों का संचालन करता है। गृह मंत्रालय को भेजी गई सुरक्षा एजेंसियों की यह रिपोर्ट चौंकाने वाली है कि घुसपैठ के दम पर पूर्वोत्तर की जनसांख्यिकी बदलकर आज वहां अलग "होमलैंड" मांगने की तैयारी चल रही है। असम में कांग्रेस के नेतृत्व वाली गोगोई सरकार अपनी सत्ता बचाए रखने के लिए "वोट के खेल" में व्यस्त है। असम की कांग्रेसी सरकार के मंत्रियों व अलगाववादियों की मिलीभगत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि एन.सी. हिल्स स्वायत्त परिषद् को विकास के लिए गया पैसा उग्रवादियों के हाथों में पहुंच रहा है। इस खतरे को असम के वरिष्ठ पत्रकार बेजबरुआ की चिंताओं में साफ देखा जा सकता है कि तरुण गोगोई को न बंगलादेशी घुसपैठिये दिखते हैं और न भारत विरोधी नारे सुनाई देते हैं। वोट बैंक की लालची इस सरकार से उनके खिलाफ सख्ती की उम्मीद मत करिए।
विडम्बना देखिए कि माओवादियों के हाथों में आने के बाद नेपाल भी भारत विरोध का केन्द्र बनता जा रहा है, वहां चीन व आईएसआई खुलकर भारत विरोधी षड्यंत्र रच रहे हैं। इसी षड्यंत्र के तहत मानो नेपाल भारत की नकली मुद्रा का गोदाम बन गया है, जो भारत की अर्थव्यवस्था को खोखली करने के लिए आईएसआई की ही एक चाल है। नेपाल के पहले माओवादी प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल उपाख्य प्रचंड ने जिस तरह परंपरा के विरुद्ध अपनी प्रथम विदेश यात्रा भारत के बजाय चीन में की, उससे चीन और माओवादियों की दुरभिसंधि भी सामने आ गई। अब सत्ताच्युत होने के बाद प्रचंड लगातार भारत के विरुद्ध जहर उगल रहे हैं। चीन ने किस कदर नेपाल में अपने पिट्ठू खड़े कर दिए हैं जो उसकी भाषा बोलते हैं, यह उसका प्रमाण है।
यही चीन कितने शातिर और कूटनीतिक तरीके से भारत के लिए सीमाओं पर खतरे खड़े कर रहा है, इस ओर हमारे केन्द्रीय नेतृत्व की अनदेखी चिंताजनक है। वह कभी सिक्किम को विवादास्पद क्षेत्र बताता है, कभी अरुणाचल को, भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण कर उसके द्वारा सड़क निर्माण तक की खबरें आती रही हैं। तवांग पर उसका अड़ियल रुख भारत को परेशानी में डालने वाला रहा है। इसी तरह अरुणाचल प्रदेश में "एशियन डेवलपमेंट बैंक" की ओर से निवेश किए जाने पर भी उसने जबर्दस्त विरोध किया था। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत विरोध की उसकी मानसिकता बार-बार सामने आती रही है, न केवल भारत के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्य बनने के मुद्दे पर, बल्कि जब भारत ने वहां जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित करने की मांग की, तब चीन ने पाकिस्तान का साथ देते हुए इसका पुरजोर विरोध किया।
अब वही चीन एक ओर भारत के साथ 13वें दौर की वार्ता करता रहा, और दूसरी ओर उसके "थिंक टैंक" का एक सैन्य विश्लेषक एक लेख लिखकर भारत को टुकड़े-टुकड़े कर देने की वकालत करता रहा। यह महज संयोग नहीं है कि वार्ता के तुरंत बाद इस लेख में ये सुझाव सामने आए कि "चीन भारत को 20-30 स्वतंत्र देशों में बांटने की रणनीति पर काम करे।" वैसे भी चीन में जिस तरह का सरकारी नियंत्रण है, उसके चलते वहां स्वतंत्र रूप से सरकारी नीतियों को लेकर टीका-टिप्पणी करने की छूट नहीं है। इसीलिए इस सुझाव में निश्चित ही चीनी मंतव्य झलकता है और चीन की धुर भारत विद्वेषी मानसिकता भी, जिसकी पंडित नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक सभी सेकुलर प्रधानमंत्री अनदेखी करते रहे। जाहिर है चीन सरकार की रणनीतिक सहमति के बिना इस प्रकार का लेख जारी नहीं हो सकता। चीन भारत के प्रति अपने पूर्वाग्रहों से कभी मुक्त नहीं हो सका, तब भी नहीं जब नेहरू ने अपनी शांतिदूत की छवि बनाने के लिए पंचशील सिद्धांत प्रतिपादित किया और हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा दिया। तब चीन ने भारत की पीठ में छुरा घोंपकर अपनी मंशा जता दी थी। अपनी विस्तारवादी मानसिकता के दूरगामी लक्ष्यों को ध्यान में रखकर ही उसने भारत पर आक्रमण से पहले तिब्बत पर कब्जा किया ताकि भारत तक उसकी पहुंच आसान हो जाए और दुर्भाग्य से भारतीय नेतृत्व इस षड्यंत्र से अनजान रहा। तिब्बत भारत की सुरक्षा दीवार था, लेकिन हमारे नेताओं की गफलत से वह दीवार ढह गई। धीरे-धीरे तिब्बत में अपना सशक्त सैन्य ढांचा खड़ा कर उसने भारत के लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। पर उस क्षेत्र से राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण पहलू जुड़ा होने के बावजूद सोनिया पार्टी की सरकार सुस्त है। एशिया में चीन भारत के लिए सबसे बड़ी सामरिक चुनौती बन गया है। इस ओर नौसेनाध्यक्ष एडमिरल सुरीश मेहता की चिंता भी साफ झलकती है कि भारत के लिए चीन दीर्घकालीन चुनौती है, लेकिन चीन सैनिक तौर पर काफी ताकतवर है। पिछले दिनों एक रक्षा विशेषज्ञ ने तो यह आशंका व्यक्त की है कि चीन 2012 में भारत पर आक्रमण कर सकता है।
"इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटजिक स्टडीज" नामक संस्था, जो वैश्विक और सामरिक मामलों में चीन सरकार को सलाह देती है, की वेबसाइट पर जारी लेख खतरनाक चीनी मंसूबों की झलक है, जिसमें कहा गया है कि भारत को तमिल, असमी, कश्मीर जैसे अनेक "राष्ट्रों" में विभाजित कराने में मदद करनी चाहिए। लेख में असम के अलगाववादी संगठन उल्फा को खास मदद करने की हिमायत है, जबकि पश्चिम बंगाल को भारत से अलग करने को बंगलादेश की मदद करने को कहा गया है ताकि एक स्वतंत्र बंगाली राष्ट्र खड़ा किया जा सके। लेख में यह स्पष्ट लिखा है कि चीन को पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, भूटान जैसे अपने मित्र देशों की सहायता से भारत को 20-30 राष्ट्रों में विभाजित कर देना चाहिए। इस लेख में एक आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि भारत को हिन्दू राष्ट्र माना गया है जो धार्मिक आधार पर एक है। क्या यह भारत के कामरेडों व सेकुलर सोच वाले बुद्धिजीवियों व राजनेताओं के मुंह पर तमाचा नहीं है, जो भारत को हिन्दू राष्ट्र कहने पर बेहद चिढ़ते हैं? दरअसल पाकिस्तान हो या चीन, भारत का हिन्दुत्व इन दोनों के लिए ही साझा दुश्मन है। जहां पाकिस्तान के दारुल इस्लाम के मजहबी संकल्प को पूरा करने में भारत का हिन्दुत्व सबसे बड़ी बाधा है, वहीं चीन की कम्युनिस्ट विचारधारा का विस्तार भी हिन्दुत्व के प्रभाव के कारण बाधित है। इसके विरुद्ध दोनों की दुरभिसंधियां खुलकर सामने आ चुकी हैं। 1948 में कश्मीर का जो करीब 78000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पाकिस्तान ने हथिया लिया, उसमें से 2600 वर्ग किमी. क्षेत्र पाकिस्तान ने 1963 में चीन को भेंट कर दिया जिससे काराकोरम मार्ग का निर्माण हुआ और चीन-पाकिस्तान और नजदीक आ गए। 1962 में चीनी हमले में भारत करीब 38000 वर्ग किमी. भूमि पहले ही चीन के हाथों गंवा चुका था। पाकिस्तान के परमाणु बम को विकसित करने में भी चीन की भूमिका से कोई अनजान नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी चीन भारत के विरुद्ध पाकिस्तान का कितना समर्थन करता है, यह भी सर्वज्ञात है, क्योंकि अपने साझा दुश्मन भारत के खिलाफ वे कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं।
भारत की स्वतंत्रता की राह में मातृभूमि की बलिवेदी पर अनगिनत बलिदानियों के शीश चढ़े, असंख्य लोगों ने ब्रिटिश साम्राज्य की क्रूर यातनाएं झेलीं, लेकिन वे न डिगे, न कंपित हुए और न भयग्रस्त। दमनकारी अंग्रेजी शासकों की छाती पर चढ़कर उन्होंने भारत का शौर्य अंकित किया। परंतु दुर्भाग्य से स्वाधीनता मिली तो आधी-अधूरी, देश बंट गया। उस बंटवारे के दौरान हुए भीषण कत्लेआम का दंश आज भी उसके साक्षी लोगों के मनों को पीड़ा से भर जाता है। देशवासियों ने 1947 को आजाद हुए भारत की एकता-अखंडता बनाए रखने का संकल्प व्यक्त करते हुए संपूर्ण भारत की अखंडता का स्वप्न भी पाला, जिसे अभी पूरा होना है। लेकिन चीन, पाकिस्तान व बंगलादेश जिस तरह भारत को खंड-खंड कर देने के मंसूबे पाल रहे हैं, खाका तैयार कर रहे हैं, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है। वोट की राजनीति करने वाले और सत्ता के लालच में राष्ट्रविरोधी तत्वों को प्रश्रय देने वाले, विश्वमंच पर भारत की एक सशक्त व स्वाभिमानी राष्ट्र की छवि बनाने के बजाय उसे एक "सॉफ्ट स्टेट" के रूप में प्रस्तुत करने वाले सेकुलर नेताओं को यह भलीभांति समझ लेना चाहिए। कांग्रेस नीत संप्रग सरकार जिस तरह सत्ता स्वार्थों व अपनी समझौतापरस्त नीति के कारण अलगाववादी, आतंकवादी और भारत के विखंडन के मंसूबे पालने वाले तत्वों के सामने राष्ट्रीय हितों को तिलांजलि देकर घुटने टेक रही है, यह देशवासियों के समक्ष सर्वाधिक चिंता का विषय है। राष्ट्रीय हितों की अनदेखी महंगी पड़ सकती है। संसद ने भारत की भौगोलिक अखंडता को बनाए रखने का जो सकंल्प व्यक्त किया था, उसे पूरा करने की आवश्यकता है।

1 टिप्पणी:

  1. विखंडन की सोच आपकी हो सकती है सभी की नहीं ? हमारा देश अखंड रहेगा .... वन्दे मातरम

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