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नया धमाका

11/27/2010

बीसवीं सदी में भारतीय इतिहास के छः काले पन्ने भाग 3

दूसरे काले पन्ने को भारत का काला पन्ना कहा जाये या विश्व का ही एक काला पन्ना माना जायेए इसे भविष्य तय करेगा। क्योंकि इस पन्ने में कालापन और दर्द की कसक इतनी ज्यादा है कि यह विश्व की अन्य किसी भी घटना में दिखाई नहीं देती। कल्पना करे कि हमारे शहर या प्रान्त को धर्म के आधार पर बांट दिया जाये तो क्या होगा। अपना पैतृक घर, कीमती सामान वहीं छोड़, सालों की बसाई गृहस्थी उजाड़कर शहर अथवा प्रदेश के दूसरे कोने में चले जाने को मजबूर कर दिया जाए तो ....। कुछ घंटों में घर से भागने को कहा जाये! वह भी ऐसी सड़कों और मोहल्लो से जो भीषण दंगो की चपेट में हो! यह सब इसलिए किया जाये क्योंकि जिस हिन्दु धर्म को हम मानते है उसके लोग दूसरे क्षेत्र में रहते है और यह इलाका मुसलमानों का है। रास्ते में लोग आपकी पत्नी, बच्चे, भाई-बंधु की हत्या कर दे, लूटपाट करे तो आपको कैसा लगेगा!
1947 में भारत के एक हिस्से को धर्म के आधार पर अलग कर, शेष हिस्से में उसी आधार को अस्वीकार करने का जो दो मुंहेपन और दोहरे मापदण्डों वाला तथा राष्ट्र के साथ क्रूर मजाक करने वाला आचरण रूपी अपराध कांग्रेस ने किया है, वह अकेला अपने आप में इतना बड़ा पाप है कि उसके लिए सारे कांग्रेसी सौ पीढ़ियों तक आजीवन प्रायश्चित करें तो भी कम है। विश्व के किसी भी सुसभ्य समाज में इस अपराध के लिए कम से कम नहीं सजा होगी जो कोई सभ्य समाज एक अपराधी को ज्यादा से ज्यादा सजा दे सकता है। संसार में साम्प्रदायिकता का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि देश का हिस्सा धर्म के आधार पर अलग कर दिया जाये। सत्ता प्राप्त करने की जल्दी में लाखों देशवासियों को असमय ही मौत के हवाले कर दिया गया। चोरी और सीनाजोरी तो तब है जब अपने इस अपराध पर विभाजन करने वाले कांग्रेसियों को किसी प्रकार का अफसोस तक ना हो!
आज पाकिस्तान व बांग्लोदेश में जितने मुसलमान निवास करते है उससे कही अधिक भारत में है। धर्म के आधार पर बना हुआ पाकिस्तान अतिमहत्वाकांक्षी राजनेताओं की असफल योजनाओ का वह बदसूरत स्मारक है जिसके नीचे प्रेम नहीं घृणा दफन है। पाकिस्तान जिस सिद्धांत पर बना वह सिद्धांत आज पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। यह प्रमाणित हो चुका है कि समकालीन समय में जिन्होने देश को धर्म के आधार पर बांटने की योजना बनाई, जिन्होने उसमें सहमति दी और जो मौन रहे वे सब इस देश और मानव जाति की नजरों में उन हत्याओं और बलात्कारों के लिए नैतिक रूप से जिम्मेवार है, जो विभाजन के समय हुए थे।लार्ड वावेल ने भारत के सम्बंध में एक बहुत अच्छी बात कही थी, उसने कहा था,
गॉड हेज क्रिएटेड दिस कन्ट्री वन, एंड यू केन नॉट डिवाइड इट इन टू ।जो  बात ब्रिटेन में पैदा होने वाले राजनेता को समझ में आई वह भारत में जन्में जवाहरलाल नेहरू की समझ में नहीं आई। वास्तव में दोनो नेताओं में अंतर बहुत थोड़ा भी है और बहुत ज्यादा भी। वावेल ब्रिटेन में खड़े होकर भारत को देख रहे थे और नेहरू भारत में खड़े होकर ब्रिटेन को। एक कहावत है-
आप वहां देखिए जहां आपको जाना है अन्यथा आप वहां चले जायेगे, जहां आप देख रहे है।
पाकिस्तान कैसे बना! इस प्रक्रिया को समझने के लिए नेहरू के विचारों में होते बदलाव को गहराई से समझना आवश्यक है। भारत के पहले प्रधानमंत्री बनने के पांच साल पूर्व नेहरू से पूछा गया जिन्ना पाकिस्तान की मांग कर रहे है आपका क्या विचार है! नेहरू ने तमतमाते हुए जबाब दिया ''नथिंग इट इज फेंटास्टिक नोनसेन्स!''
 देश का संचालन करने की चाह रखने वाले की बोली गई बातो को तार-तार करके पढ़ना चाहिए। समाज उन्हे जो साधन, सुख-सुविधाएं प्रदान करता है वे इसलिए होती है कि वे बेहतर काम कर सके, न कि आमोद प्रमोद करते हुए मदमस्त घूमने के लिए। इन्ही नेहरू की उपस्थिति में भारत का विभाजन हुआ। उनके सामने हुआ, उनकी सहमति से हुआ। देश का उन्होने अपने हाथो से बांटा। समय बीता 1950 में फिर एक पत्रकार ने नेहरू से पूछा पाकिस्तान के सम्बंध में आपके क्या विचार है! नेहरू बोले ''नाऊ इट इज ए सेटल्ड फैक्टस!!'' एक राजेनता जो यह ना देख पाया कि देश विभाजन की ओर बढ़ रहा है। देश का प्रधानमंत्री बनने की चाह रखने वाला यह गणित ना लगा सका कि देश बंट रहा है, कटने जा रहा है। सत्ता की वासना ऐसी अनियंत्रित छटपटाहट में बदल जाये कि हमें मरते व कटते हुए हिन्दु-मुस्लिम ना दिखे। सत्ता प्राप्ति की ऐसी भी क्या लालसा कि उसके लिए मानव जाति को इतनी भारी कीमत चुकानी पड़े। क्या फर्क पड़ जाता अगर देश को आजादी 6 महीने पहले मिलती या बाद में। अंग्रेजों को तो जाना ही था, उन्होने अपना सामान बांध ही लिया था। वह छटपटाहट माउंटबैटन या एडविना की नजरों से नहीं बच पाई थी। उस रंगमंच के सभी पात्रों के अपने-अपने सपने थे। सभी के अपने गंतव्य थे। वे सब मिलकर भारत को बांट रहे थे और भारत की भोली-भाली जनता उनके षड्यंत्रों को समझ नहीं पाई। सच तो यह है कि कांग्रेस के डीएनए में सत्ता के प्रति लोलुपता साफ दिखाई देती है। आजादी के बाद सत्ता-प्राप्ति की इस वासना ने इतना विकराल रूप धारण कर लिया कि उसने करीब-करीब देश की राजनीति का ही कांग्रेसीकरण कर डाला। कपड़े पहनने से लगातार उठने-बैठने तक, बातचीत करने की शैली से लगाकर कार्य करने की पद्धति तक। सबमें समानता आ गई। बहुताय जिले के नेता प्रान्तों की राजधानियों को पत्र-पुष्प् भेन्ट करते है और प्रान्त के लोग चुनाव फंड के नाम पर राष्ट्रीय नेताओं को पैसा देते है। देते समय कहते है चुनाव के लिए है सर! सर लीजिए, लेकिन होती है वह व्यक्तिगत भेन्ट। नेहरू को शरणम गच्छामि लोग पंसद थे। कांग्रेस की संस्कृति में सबसे बड़ा नेता कहता है- तुम बने रहो, संवैधानिक पदों को भोगते रहो, बस हमारी कृपा के पात्र बने रहना। मैं जो चाहूं वही करो, नियुक्ति हो या निष्कासन, निर्णय हम करेगे, क्रियान्वयन तुम करना। मेरी हां में हां रही तो तुम राजपथ पर चलते रहोगे अन्यथा वनवास के लिए तैयार रहो। उन्हे स्वाभिमान से खड़े नेताजी सुभाषचन्द्र बोस अच्छे नहीं लगते। फिर चाहे अपना स्वतंत्र मत व्यक्त करते श्यामा प्रसाद मुखर्जी हो या चन्द्रशेखर आजाद। अगर आपने अपनी आवाज उठाई तो बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा। बगैर रीढ़ के और सत्ता के लिए कुछ भी करेगें का भाव रखने वाले लोग देश के विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कभी भी बैठ जाते है। ऐसे लोगो के नेतृत्व में देश घिसट-घिसट कर रेंग तो सकता है लेकिन संभलकर चल नहीं सकता। आजादी के आंदोलन के समय सुभाष बाबू का देश से बलात निष्कासन और सरदार पटेल को नेपथ्य में धकेलने की जो कूटनीतिक चाले चली गई, उसका परिणाम आज देश भुगत रहा है। सत्ता के लिए कांग्रेसियों के जब प्राण निकल रहे थे जब अंग्रेजों ने कांग्रेस नेतृत्व से पूछा था कि हम देश को आजाद करने जा रहे है, लेकिन पहले काटेगे फिर बांटेगे और फिर तुम्हे सौंपेगे! बोलो तैयार हो!! और दुर्भाग्य है कि कांग्रेस के नेता देश को बांटने के लिए तैयार हो गए। सच तो यह है कि हमने आजादी अंग्रेजों की इच्छा से नहीं, बल्कि अपने बाहुबल से प्राप्त की थी। वे हमें आजाद करके नहीं गए भारतीयों ने उन्हे भगाया। यह बात सड़क पर चलते आम नागरिक की समझ में आ रही थी लेकिन नेहरू की समझ में नहीं आई। उन्हे लगता था कि मांउटबैटन का मूड खराब हो गया तो शायद आजादी दूर चली जायेगी। नेहरू को कौन समझाता कि बंबई बंदरगाह में हुए विस्फोट आजादी के आने का शंखनाद था, न कि माउंटबैटन और एडविना का मायारूपी मकड़जाल।
सैफोलोजिस्ट से प्रभावित आज की राजनीति में उस समय के कुछ चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण करे तो परिणाम बड़े रोचक मिलते है। आज जो पाकिस्तान और बांग्लादेश है वहां 1946 में प्रतिनिधि सभाओं के चुनावों में मुस्लिम लीग हार गई और जो वर्तमान भारत है उसमें मुस्लिम लीग जीत गई। अर्थात वह मुस्लिम लीग जो पाकिस्तान की मांग कर रही थी वह पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में जनता द्वारा अस्वीकार कर दी गई। बलूच, सिंध, पंजाब और बंगाल के मुसलिमों ने मुस्लिम लीग को ठुकरा कर अपना वोट कांग्रेस को दिया था। बलूच प्रान्त के गांधी, खान अब्दुल गफ््फार खान ने जीते जी कभी पाकिस्तान में वोट नहीं डाला। जब तक जीवित रहे हर चुनाव में दिल्ली आते और भारत में वोट डालते थे। उन्होने दिल्ली में अपना आवास सदा बनाए रखा। वे कहते थे, मैं पाकिस्तान के वजूद को अस्वीकार करता हूं। जब तक जिंदा हूं। भारत का हूं और भारत का रहूंगा।
कांग्रेस मुसलमानों से बातचीत के लिए मुस्लिम समाज से गलत प्रतिनिधियों का चुनाव करती रही। अब्दुल गफ्फार खान जैसे देशभक्त को छोड़कर वह जिन्ना को सर पर बिठाए घूमती रही।
जिन्ना को ही मुसलमानों का एकमात्र नेता मानती रही। कांग्रेस के नेता जिन्ना से बार-बार कहते रहे - ''जिन्ना मेरे भाई मान जाओं, हम तुमसे प्रार्थना करते है, मान जाओं!'' दूसरी ओर जिन्ना उनकी हर मांग को अपनी सिग्रेट के धुंए में उन्ही में मुंह पर उड़ाता रहा। यह कौनसी कूटनीति थी और कैसी राजनीति! तब भी समझ से परे थी और आज भी। भारत को धर्म के आधार पर बांटना भारत की गत शताब्दी का दूसरा काला पन्ना है। इस काले पन्ने के लेखक, नायक और महानायक जवाहरलाल नेहरू और केवल नेहरू है।                                         (क्रमशः)

1 टिप्पणी:

  1. वास्तव में यह भारत का दुर्भाग्य ही रहा कि जवाहरलाल नेहरू हमारे देश का प्रथम प्रधानमंत्री बना, जिसे ना भारत की माटी से लगाव था, न ही भारत के हिन्दू समाज से। विभाजन के समय में हिन्दु समाज के साथ क्या नहीं हुअ।

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